पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/३८२

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१४७१ इत्यनेन लल्लोक्त श्रीपर्युक्त च विविच्य स्पष्टाशयं शंकुयन्त्रं कथयतीति । सूर्य सिद्धान्ते “‘नरयन्त्रं तथा साधु दिवा च विमले रवौ । छायासंसाधनैः प्रोक्त कालसाधनमुत्तमम् ।” एवं कथ्यते ।। इति ३९ ॥ अब शंकु को कहते हैं । हि- भा.-मूल (नीचे) में दो अंगुल मोटा, अग्र में सूची (सूई) के आकार का, बारह अंगुल ऊचा, अग्र में जो रन्ध्र (छिद्र) तगत अवलम्ब से ऋजु (लम्बाकार), प्राधारवृत्त केन्द्र से अग्रपर्यन्त रन्ध्र में मिला हुआ शंकु समझना चाहिये इति । सिद्धान्त शेखर में ‘भ्रम विरचितवृत्तस्तुल्यमूलाग्र भागो । द्विरदरदनजन्मा सारदारुभवो वा' इत्यादि विज्ञान भाष्य में लिखित श्लोक से श्रीपति कहते हैं कि शाण से विरचित है वृक्ष जिसमें अत एव समान है मूल भाग और अग्र भाग, अर्थात् घिसने वाले पत्थर से इस तरह घिसा गया है जिससे सब जगह किये हुये वृत्तों की परिधि तुल्य है । हाथी दांत के या सार वाले काष्ठ क बना हुआ, गुरु (भारी), सरलाकारव्रण (प्रवड़ खुवड़) से रहित, तत्व भाग जिसका समान है, ऐसे बारह अंगुल के शंकु प्रशस्त है । ज्यौतिष सिद्धान्न ग्रन्थों में दिशा देश और काल के ज्ञान के लिये सब स्थानों में शंकु उपयोगिता के कारण प्रसिद्ध है अर्थात् हर जगह शंकु की जरूरत होने से शंकु प्रसिद्ध है लेकिन वह शंकु कैसा होना चाहिये वही बात श्रीपति ने उपर्यु क्त श्लोक से कही है: उपयुक्त लक्षणों से युक्त शंकु से भिन्त शंकु प्रशस्त (शोभन) नहीं है । यहां लल्लाचार्य ने "भ्रम सिद्धः सममूलाग्रपरिधिरतिसूगुरु सारदारुमयः’ इत्यादि विज्ञानभाष्य में लिखित श्लोक के अनुसार कहा है, लल्लोक्त का ही ने श्रीपति अनुवाद किया है । सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय में "समतल मस्तक परिधिश्न मसिद्धो दन्तिदन्तजः शंकुः" इत्यादि | से भास्कराचार्य भी लल्लोक्त और श्रीपयुक्त को ही सोच विचार कर स्पष्ट रूप से शंकु यन्त्र को कहते हैं । सूर्य सिद्धान्त में ‘नरयन्त्रं तथा साधु दिवा च विमले रवौ । छाया संसाधनैः’ इत्यादि विज्ञान भाष्य में लिखित श्लोक के अनुसार कहा गया है, बांकुच्छाया से कालज्ञान होता है जैसे छाया ज्ञान से छाया'+शंकु= w छाय'+१२' =छायाकणें । तब छायाकxशं= इहति । इटुहृति से इष्टहृति.त्रि ==इष्टान्त्या । इस १२ में चरज्या संस्कार करने से सुत्र ज्ञान होता है, इससे उन्नत काल का ज्ञान सुलभता ही से होता है, सिद्धान्त शिरोमणि आदि देखने से स्फुट है इति ॥३८॥ D इदानीं शंकुयन्त्रेण कालज्ञानमाह । छायां दृग्ज्यां दृष्टिं छायाकर्मवलम्बकं शंकुम् । परिकल्प्य शंकुयन्त्रे योज्यं घटिकादि यष्टधक्तम् ॥४० ॥