पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/३६५

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१४५४ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते ग्राग्रयोरुपरि गता रेखोदयास्तसूत्रस् । उदयास्तसूत्रस्य शंकुमूलस्यान्तरं शंकृतलम् । तदाऽक्षक्षेत्रानुपातेन यदि शंकुना शंकुतलं लभ्यते तदा द्वादशशंकु शंतल ४१२ ना किमिति समागच्छति पलभा तत्स्वरूपम् = एतावताऽऽचार्योक्तमु पपन्नम् ।।२६। शक अब यष्टियन्त्र से पलभाज्ञान कहते हैं । हि. भा–उदयास्तसूत्र और शत्रु कुल के अन्तर (शङ,कुंतल) को बारह से गुण कर शङ्कु ले भाग देने से पसभा होती है। बिना उदयास्तसूत्र के भी पलभा ज्ञान आगे कहते हैं इति ॥२६॥ उपपत्ति । पूर्व में समान पृथिवी में लिखित वृत्त क्षितिजवृत्त है । यष्टि त्रिज्या के बराबर है । यष्टि को इस तरह धारण करना चाहिये जिससे यष्टयग्र को बढ़ाने से रवि बिम्बकेन्द्र में जाययष्टयग्र से नीचे जो लम्ब होगा वह शड्कु है । त्रिज्यारूपयष्टि और शङ,कुरूप लम्ब का वर्णान्तरमूल नतशज्या (दृग्घ्या) शङ,कुमूल और वृत्तकेन्द्र का अन्तररूप है । शङ्कु- मूल से पूर्वापरसूत्र पर्यन्त लम्बरूपभुज है । शङकुमूल से उदयास्तसूत्रपर्यन्त लम्बरूप शङ्कृतल है। तब अनुपात करते है यदि शक में शर्कतल पाते हैं तो द्वादशा (बारह अङ्गुल) इशुल शङ,कु में क्या इस अनुपात से पलभा आती है, इसका स्वरूप शंतल ४१२ =पलभा । इससे आचार्योक्त उपपन्न हुआ इति ॥२८॥ शङञ् इदानीं भुजद्वयतः पलभाज्ञानमाह । प्राच्यपराशङ कृतलान्तरद्वयान्तरयुतिः समान्यविंशोः । द्वावशगुणिता विषुवच्छाया शवन्तर विभक्ता ॥३०॥ सु. आ--शकुमूलप्राच्यपरान्तरं भुजः। एवमेकस्मिन् दिने भुजद्वयं ज्ञयश्च तयोः समान्यदिशोरन्तरयुतिः कार्या सा द्वादशगुणिता शंक्वन्तरविभक्ता विषुव- च्छाया भवति । ‘सुजयोरेकान्यदिशोरन्तरमैक्य रविक्षुण्णभि-दयादिभास्करोक्त मेतदनुरूपमेव अत्रोपपत्तिः । भास्करविधिना स्फुटा सजातीयक्षेत्रयोर्युजयोः कोट्योः कर्णयोरन्तरतो योगाद्वा तथैव सजातीयक्षेत्रोत्पन्नत्वात् ॥३०१ !