पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/३२१

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१४१० ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते कुच्छन्नलिप्तानुरतो विशोध्याः स्वभुक्तितिथ्यंशमिताः प्रभार्थं । इति विशेषमा हेति ।६४।। अब दृगोल के दृश्यत्व और अदृश्यत्व को तथा लम्बन और । नति की उत्पत्ति के कारण को कहते है । हि. भा.-दृग्मण्डलार्ध में भूव्यासाघं घटाने से भूपृष्ठत्थ लोगों का दृश्यखण्ड होता है । दृग्मण्डलार्ध में भूव्यासार्धे जोड़ने से अदृश्य खण्ड होता है । क्योंकि द्रष्टा पृष्ठ के ऊपर रहता है इसलिये लम्बन और नति होती है (अर्थात् लम्बन और नति की उत्पत्ति होती है)। उपपत्ति । यहां संस्कृतोपपत्ति में लिखित (क) क्षेत्र को देखिये । भू = भूकेन्द्र, पृ=ध्रपृष्ठस्थान चभूज=गर्भक्षितिजधरातल । नqम =पृष्उक्षितिजध, भूg = भूव्यासार्धे =भूव्या, ग्र= दृग्म ण्डले ग्रहः। नखम=क्षितिज से ऊपर दृग्मण्डलाधं ==दृश्यखण्ड । भूख =दृग्मण्डलव्यासार्ध। हरमण्डलव्याई-भूव्याई=मुख । पृष्ट (क्षपृष्ठ) स्थित द्रष्टा दृग्मण्डलार्ध (दृश्यखण्ड) स्थित (ग) ग्रह को देखता है । क्षितिज अधोभाग में दृग्मण्डलाधे = अदृश्यखण्ड=ट्टग्मण्डलाच्याई +भूव्याई । भू और घु बिन्दुओं से ग्र–प्रहगत भूग्र, पुग्न रेखाद्य को बढ़ाने से नीलाम्बर गोलीय हुग्मण्डल में जहां लगता है तदन्तर्गत टुरमण्डलीय चाप दृग्लम्बन कहलाता है । यरक्षद्वलम्बन प्रख== पृष्ठीयनतांश=<प्रमूख, कोणज्या और कोणोन भाषीशज्या बराबर होती है अत: ज्या प्रमूख = ज्या (१८०. - <प्रqख)=पृष्ठीयदृग्ज्या-ज्या प्रक्षुभ्र । भूग्र=प्रहकणें । तब अनुपात से - पृदृज्या. भूव्याई _=ज्या भूग्रपृ=दृग्लम्बनज्या । क्योंकि अकण < भूग्रपृ=<यग्रर । नीलाम्बर गोल के केन्द्र जहां तहां मान सकते हैं, अतः ग्र बिन्दु में भी उसका केन्द्र हो सकता है, अतः यग्रर=यचाप, लेकिन यरचाप-दृग्लम्बन ।

< भृगपृ = दृग्लम्बन । नति दृग्लम्बन के अधीन है । लम्बन और नति की

उत्पति के कारण भूपृष्ठ बिन्दु ही है । सिद्धान्तशेखर में ‘ढमण्डलाधं यदिहोर्ववत्ति’ इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्लोक से श्रीपति ने कहा है । भास्कराचार्य सिद्धान्तशिरोमणि में "कुपृष्ठगानां कुदलेन हीनं" इत्यादि विशेष कहते हैं इति ॥६४॥ इदानीं परमलम्बनावनती आह । क्षितिजे भूवललिप्ताः कक्ष्यां दृङ्नतिनंभो मध्यात्। अवनतिलिप्ता याम्योत्तरा रविग्रहवदन्यत्र ॥६५॥ । सु. भा-नभोमध्यात् खस्वस्तिकात् कक्षायां ग्रहगोले दृग्मण्डले क्षितिजे