पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/३१६

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गोलबन्धाधिकारः १४०५ लगता है तदन्तर्गत नाडीवृत्तीय चाप उस राशि का निरक्षदेशीय उदयमान होता है। जैसे मेषादिगत ध्रुवप्रोत्तवृत्त में नाडीवृत्त मेषादि (गोलसन्धि) ही में लगता है वहां (मषादि) से मेषान्तोपरिगत धृव प्रोतवृत्त नाडीवृत्त के सम्पात पर्यंन्त निरक्षदेशीय मेषोदयमान है । एवं मेषान्तो (वृषादि) परिगत धृव प्रोतवृत्त तथा वृषान्तोपरिंगत ध्रुव श्रोतवृत्त के अन्तर्गंत नाड़ी मृत्तीय चाप निरक्ष देशीय वृषोदयमान है एवं वृषान्तो (मिथुनादि) परिगत ध्रुवप्रोतवृत्त तथा मिथुनान्तोपरिगत ध्रुवम्रोतवृत्त के अन्तर्गत नाडीवृत्तीय चाप निरक्ष देशीय मिथुनोदय मान हैं, इन उदयमानों में न्यूनाधिक्य क्यों होता है तदर्थं निम्नलिखित युक्ति है यहां संस्कृतोपपति में लिखित (१) क्षेत्र को देखिये । गो=गोलसन्धि=मेषादि, मे– मेषान्त बिन्दु । वृ=व्यान्तबिन्दु । मि=मिथुनान्त विन्दु । गोमे=भवृ= वृमि-३०° गोन= मेषोदयमान । नम=वृषोदयमान । मश= मिथु नोदयमान । ध्रः = ध्रुव। श्रुमि =परमाद्यज्य युज्याचाप घूमे =मेषन्तद्युज्याचप । भृz= वृपा न्त द्युज्याचाप । भृगोमि=परमापयुज्यांश, < मेवृधु-वृषान्तजयष्टच श=६०--वृषान्त जायनवल । गोल सन्धि में आयनवलन परमं जिनांश (२४) के बराबर होता है अयन सन्धि (मिथुनान्त) में आयनवलनाभाव होता है अतः इन दोनों के बीच (वृषान्त) में आयनवलन <२४, परमापयुज्याचाप=&०-जिनांश=६०-२४=६६, वृषान्त में यष्टघ ' श=६० –-वृषान्तायनवलन=६०-जिनांशाल्पायनवलन । अत: वृषान्त में यष्टयोशपरमाल्प- ज्याचाप । भृगोमे चापीय त्रिभुज में अनुपात करते है परमाल्पवु ४ ज्या ३० < गोधूमे = मेषोदयज्या = ज्यागोन । भुमेवृ चापीय त्रिभुज में अनुपात से वृषान्तयष्टिज्या ३० =ज्या मेधुवृ=ज्यानम=वृषोदयज्या परन्तु वृषान्तयष्टि> वृषान्तयx ज्या ३० परमाल्पञ्च x ज्या ३० अर्थात् वृषोदयज्या > मेषान्तद्य मेषोदयज्या वा मेषोदयमान < वृषोदयमान । इसी तरह मिबृथु च।पीय त्रिभुज में अनुपात से वृषान्तयष्टि ४ ज्या ३० परमापद्य-भुवृ= ज्यामि = मिथुनोदयज्या । परन्तु वृषान्तयष्टि ज्यामश परमापद्म, तथा मेषान्तषु परमापद्यु अतः वृषान्तयxघ्या ३० वृषान्तय ज्या ३० अर्थात् मिथुनोदयज्या वृषो परमापद्यु मेषान्तर्° दयज्या, अतः मिथुनोदयज्या वृषोदयज्या > मेषोदयज्या, वा मिथुनोदयमानवृषोदयमान >मेषोदयमा। अत: आचार्योंक्त उपपन्न हुआ। यह उपपत्ति यथातः शिष्यवीवृद्धिदतन्त्र में जिस तरह लल्लाचार्य ने कहा है उसी तरह श्लोकान्तर से श्रीपति और भास्कराचार्य ने अपने ग्रन्थ में कहा है ।