पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२९१

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१३८२ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते अब कलात्मक बिम्बानयन को कहते हैं। हि. भा-योजनात्मक भूभाबिम्व को त्रिज्या से गुणा कर चन्द्रकर्ण से भाग देने से कलात्मक भूभाबिम्ब होता है एवं योजनात्मक रविबिम्ब को त्रिज्या से गुणाकर रविकर्ण से भाग देने से कलात्मक रविबिम्ब होता है । योजनात्मक चन्द्र बिम्ब को त्रिज्या से गुणा कर चन्द्रकर्ण से भाग देने से कलात्मक चन्द्र बिम्ब होता है इति । उपपत्ति । यहां संस्कृतोपपत्ति में लिखित (क) क्षेत्र को देखिये । के== रविबिम्बकेन्द्र । दृ= = दृष्टिस्थान=भूकेन्द्र। दृस्प, दृस्प दृष्टि स्थान से रवि बिम्ब की स्पर्श रेखा, दृके=रविकरणं केस्प=जेस्प= रविबिम्बव्यासबैंकेस्पदृ= केपदृ= &०, < केदृस्प=< केदृस्प=रवि विम्बकला, इकेप त्रिभुज में अनुपात करते हैं त्रि.केस्प _ त्रि 13° में रच्या == या<< रकण त्रि. रव्या त्रि. रविक द्विगुणित करने से भ: = रविविकला । एवं म. च°या == चविकला । त्रि.भूभाव्या = भ,भाविक इससे आचार्योक्त उपपन्न हुआ । शिद्धान्तशेखर में ‘एतानि । वकर्ण भास्करमृगाङ्कमहंप्रमाण’ इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित श्रीपयुक्त प्रकार आचार्योक्त के अनुरूप ही है । लेकिन ये प्रकार (आचार्याक्त तथा श्रीपत्युक्त) ठीक नहीं है । अनुपात से जो बिम्बकलाधेज्या आती है उसके चाप को द्विगुणित करने से बिम्बकला प्रमाण वास्त वित होता है, आचार्य बिम्बकलार्धज्या को द्विगुणित कर बिम्बकला प्रमाण कते हैं । सिद्धान्तशिरोमणि में 'सूर्येन्दुभभातनुयोजनानि’ इत्यादि संस्कृतोपपत्ति में लिखित इलोक से भास्कराचार्य बिम्बकलाघंज्या को द्विगुणित कर विम्बकला प्रमाण को कहते हैं यह भी ठीक नहीं है क्यों कि विम्बकलार्धज्या को द्विगुणित करने से द्विगुणित बिम्बकला चाप की पूर्णज्या होती है । पूर्णज्या से चाप करने का नियम नहीं है अतः भास्करोक्त प्रकार भी ठीक नहीं हैं इति ॥३४॥ इदानीं छादकंमाह। भूच्छायेन्द्रे चन्द्रः सूयं छादयति मानयोगार्धात्। विक्षेपो यद्यनः शुक्लेतरपञ्चदश्यन्ते ॥३५।। सु. भा–यदि मानयोगार्धात् मानैक्यखण्डाद्विक्षेप ऊनस्तदा शुक्ले पर्व दश्यन्ते पुणग्ते भूच्छाया चन्द्र छादयति । इतरपञ्चदश्यन्ते दर्शान्ते चन्द्रः सूर्ये छादयति । ‘भूभाविधं विधुरिनं ग्रहणे पिघत्ते' इति भास्करोक्तमेतदनुरूप मेव ॥३५॥