पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२१

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( १२ ) से आचार्योक्तवत् ही कहा है। केवल ‘ऋतुवर्णनम्’ नामक एक अधिकार सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय में लिखा है । भास्काराचार्य के पश्चवतीं और कमलाकर के पूर्व वतीं सब आचार्यो ने ऋतुवर्णन को ज्यौतिष सिद्धान्त का एक अङ्ग समझकर अपने अपने सिद्धान्तग्रन्थ में निशिचित रूप से ‘ऋतुवर्णनाध्याय' नाम देकर लिखा हैं । सिद्धान्त नत्व विवेक में—‘प्राद्ये पदेऽपचयिनी पलभाल्पिका स्यात्' इत्यादि श्रीपत्युक्त पदज्ञानबोधक श्लोकः द्वय को लिख कर कमलाकर ने ऋतुचिह्नरिदं पूर्वेरुक्त सर्वत्र तन्नहि । केवलं कूकविप्रीत्यै पदज्ञप्त्यै न तद्रवेः ।। से भास्करोक्त ऋतुवर्णन की निन्दा की है । वस्ततः कमलाकर का कथन ठीक है । भिन्न भिन्न देशों में ऋतु भिन्न भिन्न होती है; इसलिए ऋतुचिह्न से पदज्ञान ठीक नहीं हो सकता है। परन्तु-आद्य पदेऽपचयिनी पलभाल्पिका स्यात्' इत्यादि पदज्ञानबोधक पद्य ठीक सिद्धान्तशेखर में हैं। इसको कमला कर ने अपने नाम से लिखा है । जब तक सिद्धान्त शेखर उपलब्ध नहीं था, तब तक लोग यही समझते थे कि यह पदज्ञान प्रकार कमलाक रोक्त ही है। परन्तु अब वह बात नहीं रही । वस्तुत: यह प्रकार श्रीपत्युक्त ही है। कमला कर को अपनी रचना में यह मानना चाहिए था कि यह प्रकार श्रीपति कथित है । वास्तविक बात यह है कि प्राचीन आचार्य ने पदज्ञान के लिए कोई प्रकार नहीं लिखा है । इस स्थिति में श्रीपति ही इस प्रकार को लिखने के कारण ज्योतिषियों के प्रशंसापात्र हैं, यह बात अवश्य ही नि:सन्दिग्ध है। आश्चर्य की बात तो यह है कि झीपतिकृत गोलयुक्ति युक्त पद ज्ञान को छोड़कर भास्कराचार्य ने जो काव्यमय ऋतुवर्णन किया है वह बिल्कुल असंगत है । आचार्य ब्रह्मगुप्त ने चन्द्र ग्रहणाध्याय में रवि, चन्द्र औरपृथिवी का योजनबिम्ब, रवि और वन्द्र के योजनात्मक कर्ण का स्पष्टीकरण, भूभा बिम्बानयन, ग्रासभानाद्यानयन तथा परिलेख प्रकार लिखा है। श्रीपति और भास्कराचार्य चन्द्रग्रहणाध्याय ने भी कथनक्रम को लेकर विशेष रूप से वैसा ही अनुवाद किया है। ब्रह्मगुप्तकृत सम्पूर्ण सूर्यग्रहणाध्याय को श्रीपति ने प्राय: अपने श्लोकान्तरों द्वारा किया है, उदयास्तमयाध्याय में प्राचार्य ने आयन दृक्कमनियन किया है, परन्तु वह ठीक नहीं है । श्रीपति ने आयन दृक्कर्मानयन करके खनभोधृतिभिः समाहतं प्रथमं दृक्फलमायनाह्वयम् । द्युचराश्रितभोदयासुभिर्विहृतं स्पष्टमिह प्रजायते ॥ से उनका स्पष्टीकरण किया हैं। इसको देख कर भास्कराचार्य ने 'आयनं वलनम स्फुटेषुणा संगुणम्' इत्यादि से उसके अनुसार ही कहा है । चन्द्राध्याय में आचार्य ने अनेक विषयों का प्रतिपादन किया है । परन्तु श्रीपति ने केवल वराह ब्रह्मगुप्त तथा लल्लाचार्य के वहुत से श्लोकों का अनुवादमात्र ही किया है। अपनी ओर से कोई विशेष बात नहीं लिखी । केवल चन्द्र के स्पष्ट चरानयन में तथा परिलेख सूत्र प्रमाणानयन में बहुत ही प्रकारान्तर से प्रतिपादन किया है ।