भाषाटीकासमेता । (२६९) किस दिशा में सुकाल कहां अन्नकाल और किसका भंग किसकी वृद्धि होगी ऐसे प्रश्नमें ॥ ३७॥ ľ चतुर्णांमपिकेन्द्राणांमध्येयत्रशुभग्रहः || तस्यांचसस्यनिष्पत्तिःस्वास्थ्यचैव भविष्यति ॥ ३८ ॥ प्रश्नलन वा जगत्लग्न अर्थात् मेषार्कसामयिक लनसे जिस केन्द्र में शुभ ग्रह वा जिसका स्वामी बली हो उसके अनुसार दिशामें अन्न बहुत होगा, ' रागाादे उपद्रवभी नहीं होवेंगे, जहां पाप वा स्वामी निर्बल हो वहां उसके अनु- सार दुर्भिक्ष रोगादि होंगे, लमसे पूर्व चतुर्थ से दक्षिण सप्तमसे पश्चिम और दशमसे उत्तर जानना ॥ ३८ ॥ 1 यस्यांदिशिशनिःपापैर्युतोवाप्यवलोकितः ॥ दिशितस्यांच स्वास्थ्यंदुर्भिक्षंचभविष्यति ॥ ३९ ॥ जिस दिशा में शनि पापयुक्त वा पापदृष्ट हो उसमें रोगादि उपद्रव और दुर्भिक्षभी होंगे ॥ ३९ ॥ दिशियस्यांरविस्त धान्यनाशोनृपाद्भवेत् ॥ यत्रापिमंगलस्तत्रधान्यनाशोनिभीस्तथा ॥ ४० ॥ जिस दिशा में सूर्य्य पापयुत दृष्ट हों तहां राजासे अन्नका नाश होवे, जहा वैसाही मंगल हो तहां अन्नका नाश और अग्निभयभी होवे ॥ ४० ॥ यस्यांदिशिशुभाःखेटाः समस्तबलशालिनः ॥ निष्पन्नासैवविज्ञेयासस्यस्वास्थ्यंचतत्रहि ॥ ४१ ॥ जिस दिशामें शुभग्रह समस्त बलयुत हों तहां सब अन्न अच्छे होंगे और स्थ्य भी अच्छा रहेगा, बलहीन शुभग्रहोंसे अनिष्ट बलवान् पापोंसे कुछ प्रकार शुभ और मिश्रितमें मिश्रफल कहना ॥ ४१ ॥ केन्द्रे सर्वतः पापाः समस्तबलसंयुताः || देशस्त दाविनष्टोसौज्ञातव्यः शास्त्रकोविदः ॥ ४२ ॥ सभी केंद्रों में पाप बलसहित हों तो सभी देश नष्टप्राय होंगे विशेष शाख:- ज्ञोंने उनका बलाबल और संबंधादि विचारके कहना ॥ ४२ ॥
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