भाषाटीकासमेता । गुरोः सप्तमराशिस्थःप्रत्यग्रोभृगुजोयदा तदातिवर्षणंभूरिप्रावृट्कालेबलोज्झिते वर्षाकालके प्रश्नमें बृहस्पतिके सप्तममें पूर्वोदयी शुक्र हो तो वर्षाकालमें अतिवृष्टि होवे ॥ २७ ॥ ॥ ॥ २७ ॥ आसन्नंरविशशिनोःपरिवेषगतोत्तरा ॥ ( २६७ ) विद्युत्प्रपूर्णमण्डूकास्त्वनावृष्टिर्भवेत्तदा ॥ २८ ॥ सूर्य चन्द्रमाके समीप उत्तरसर परिवेप ( सौंडल वा परिधि) तथा बिजु- ली वा बादलमें छोटी चमक हो मंडूक बोलें तो अवर्षण होवे ॥ २८ ॥ नखैलिखंतोमार्जाराश्चावनिलोहिताभवेत् || रथ्यायसितुबंधाः स्युर्बालानांवृष्टिहेतवः ॥ २९ ॥ मार्जार अपने नखसे भूमि वा काष्ठ आदि खोदें तथा भूमि रक्तवर्ण हो और मार्गमें बालक खेलसे पुल बांधें तो शीघ्र वर्षा होवे ॥ २९ ॥ पिपीलिश्रेण्यवच्छिन्नासंयतावहवस्तदा || द्रुमादिरोहःसर्पाणांप्रतींदुर्वृष्टिसूचकाः ॥ ३० ॥ पिपीलिका ( छोटी मकोडी ) बहुत इकट्ठी एक पंक्तिसे चलें तथा सर्प वृक्षोंमें चढें और आकाशमें चन्द्रमाका प्रतिबिंबसा दीखे तो वृष्टि होतीहै ॥ ३० ॥ उदयास्तमयेकालेविवणकोथवाशशी ॥ मधुवर्णोतिवायुश्चेदति वृष्टिर्भवेत्तदा ॥ ३१ ॥ उदय तथा अस्तसमय में सूर्य्य वा चन्द्रमा वर्णरहित यदा शहद समान रंगके हों और अविषायु चले तो वर्षा होवे ॥ ३१ ॥ आर्द्रद्रव्यंस्पृशतियदिवावारितत्संज्ञकंवा तोयासन्नोभवतियदिवातोयकार्योन्मुखो प्रष्टावाच्यः सलिलमचिरादस्तिनिःसंशयेन पृच्छाकालेसलिलमितिवाश्रूयतेयत्रशब्दः ॥ ३२ ॥ जो प्रश्न समयमें प्रष्टा गोली वस्तु वा जल और जलसम्बन्धी वस्तुको वा ||
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