भाषाटीकासमेवा । दूरस्थजीवितमृत श्ने । ( २५३.) "वरेशीतकरेथषष्ठेतुर्येष्टमेवाप्यतिनीचगेवा || अस्तंगतेच्छिद्रपतीत्थशालेयु ऽशुभैर्दूरगतोमृतः स्यात् ॥ ४५ ॥ प्रवासी जीवित है वा मरगया ऐसे प्रश्नमें लग्नेश तथा चंद्रमा छठे हों अथवा चतुर्थ अ में अति नीचराशिस्थ अस्तंगत हों और अष्टमेशसे इत्थशाली और पाप युक्त हों तो प्रवासी दूर पहुँचकर मरगया होगा ॥ ४५ ॥ भूमेरधःस्थेनचवक्रगेनयदीत्थशालकुरुतेशशांकः || सौम्यैरदृष्टेमरणंप्रकुर्य्याद्दूरस्थितस्यापिविदेशगस्य ॥ ४६॥ लग्नसे चतुर्थके बीच स्थित किसी ग्रहसे चंद्रमा इत्थशाल करे तथा शुभग्रह उसे न देखें तो दूरदेशस्थकी मृत्यु होती है ॥ ४६ ॥ सौम्यैः 'त्यरंध्रस्थैर्विबलैश्चशुभेक्षितैः ॥ पापयुक्तौशशांकाकौतदादूरस्थितोमृतः ॥ ४७ ॥ शुभग्रह ६ | ८ | १२ | स्थानों में निर्बल शुभ ग्रहों से दृष्ट तथा पापग्रहों से युक्त हों और सूर्य चंद्रमा पापयुक्त हों तो दूरस्थित जन मर- गया है ॥ ४७ ॥ सौम्यैरदृष्टैः पृष्ठोदयेपापयुतेत्रिकोणकेंद्राष्टषष्टोपगतैश्चपापैः ॥ परदेशसंस्थोमृतोगदात्तनवमेचसूर्य्यं ॥ ४८ ॥ पृष्ठोदय १ । २ । ४ । ९ राशिमें पापग्रह त्रिकोण केंद्र और अष्टम स्थानमें हों शुभग्रह उन्हें न देखें तो परदेशमें रोगी मरगया है, जो नवम सूर्य्य हो तोभी यही फल कहना ॥ १८ ॥ तुर्य्योपरिस्थेनखगेनचंद्रमायदीत्थशालंकुरुतेशुभेक्षितः ॥ सौम्यैर्युतोवापरदेशसंस्थितःसुखीचजीवेत्पथिसौख्यमेति ॥४९॥ चतुर्थसे सप्तमके भीतर किसीग्रहशे चंद्रमा इत्थशाल करे शुभग्रहसे दृष्ट वा युतभी हो तो परदेशवाला खी जीताजागता है मार्गमेंभी सुखसे आवेगा४९ इति श्रीमहीधर • ता० नी० मा० नवमस्थान प्रश्न नि० ॥ ९ ॥
पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/२६१
दिखावट