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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/२५७

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(२४९ ) भाषाटीकासमेवा | कथयतिनष्टलाभंप्रवासिनश्चगमंत्वरितम् ॥ १९ ॥ • इन दो योगोंमें सीका शीघ्र आगमन तथा नष्टवस्तुका शीघ्र लाभ. होता है पथिकका आगमन वा रोधके योग द्रव्यके लाभालाभमें भी मिलते हैं ॥ १९ ॥ शुभ शुभेषष्ठेथ जामित्रेवाक्पतिःकंटके स्थितः ॥ पथिकाग नंतेसितेज्ञेवात्रिकोणगे ॥ २० ॥ वत हो तथा स्पति केन्द्र में हो अथवा शुक्र वा बुध त्रिकोण ९ । ५ में हो तो पथिक शीघ्र आवेगा ॥ २० ॥ षष्ठोदयेपापदृष्टे महग्वर्जितंबुधः ॥ लग्नात्पष्ठेयदापापायातुश्चनिधनंवदेत् ॥ २१ ॥ षष्ठ तथा लग्नस्थान में पापग्रहोंकी दृष्टि हो शुभग्रहोंकी न हो तथा ल- असे छठे स्थानमें पापग्रह हों तो पंडितने जानेवालेकी मृत्यु कहनी ॥ २१ ॥ यदाकूरास्तृतीयस्थादेशाद्देशांतरंगतः ॥ चौरेणैवहत स्वश्चपथिकः केंद्रगायदि ॥ २२ ॥ जो पापग्रह तीसरे हो तो पथिक एक देशसे दूसरे देशको चलागया ज सभी केन्द्रोमें पाप हों तो उस चोरॉन लूट लिया ॥ २२ ॥ पापैः त्रिलाभस्थैःकंटकस्यैःशुभग्रहैः ॥ वासी खमायाति दूरस्थोपिसुनिश्चितम् ॥ २३ ॥ पापग्रह ६ | ३ | ११ में और शुभग्रह केन्द्रोंमें हों तो पथिक दूर भी हो तोभी निश्चय करके खपूर्वक घर आवेगा ॥ २३ ॥ चतुरस्रेत्रिकोणेवापापगेहस्थितःशनिः || पापा श्चनियतंबंधनंयातुरादिशेत् ॥ २४ ॥ केन्द्र वा त्रिकोणोंमें पापग्रह तथा पापराशिमें पापदृष्ट शनि हो तो अवश्य पथिक बंधनमें पड़गया है ॥ २४ ॥ शुभ स्थिरेलग्नेस्थिरे बंधश्चरेऽन्यथा || द्वितनौ सौम्यसं तेबंधमोक्षौक्रमेणतु ॥ २५ ॥ स्थिर लग्न शुभयुक्त उक्तयोगों में हो तो बंधन स्थिर होगा. चर हो तो - नाममात्र और द्विस्वभाव हो तो बंधनसे छटगया है ॥ २५ ॥