(२३६) ताजिकनीलकण्ठी । सप्तम द्वितीय और उपचय ३ | ६ | १० | ११ स्थानों में चंद्रमा जो बृहस्पतिसे दृष्ट हो तो स्त्रीलाभ, पापयुक्त दृष्ट हो तो स्त्रीहानि करता है ॥५॥ दुश्चिक्यतनयसप्तमलाभगतः शशीविल क्षत् || गुरुरविसौम्यै विवाहदः स्यात्तथासौम्याः ॥ ६ ॥ लग्नसे चंद्रमा ३/५/७।११ स्थानमें बृहस्पति सर्थ्य बुधसे दृष्ट हो तो विवाह देता है तथा शुभग्रह भी ऐसे होने में यही फल देते हैं ॥ ६ ॥ केंद्रत्रिकोणसंस्थाः सप्तमभवनंशुभग्रहस्ययदि || शय्यायांलभतेसौपापक्षैविगतरूपाच ॥ ७ ॥ केंद्र १।४।७।१० त्रिकोण ९ । ५ और सप्तममें शुभग्रहकी राशि तथा शुभग्रह हो तो शय्यामें स्त्रीत्राप्ति होने, पापराशि उक्तस्थानोमें हो तो मिलेतो सही परंतु कुरूपा मिलै ॥ ७ ॥ अथ स्त्रीनेहः | प्रीतिस्थानप्रश्नेस्मरपतिलग्नेशमुशिले हः || सझकटककःशञ्चदृशाशशिकंबूलेतुसापिशुभा ॥ ८ ॥ स्त्रकिी प्रीतिके प्रश्नमें सप्तमेश लग्नेशका मुथशिल हो तो उससे प्रीति शत्रु- दृष्टि उनकी हो तो उससे कलह और चंद्रमा कंबूल भी करता हो तो खी सरल स्वभाव होगी ॥ ८ ॥ यदि मंदोलनेशः केंद्रेचस्यात्तदाबलीप्रष्ट || अस्तेश्वरेचमंदेकेंद्रेप्रतिवादिनोस्तिबलम् ॥ ९ ॥ जो लग्नेश और शनि केंद्र में हो तो स्त्री विवादमें पूछनेवाला बली रहेगा. जो सतमेश और शनि केंद्रमें हो तो प्रतिवादी बली रहेगी ॥ ९ ॥ उभयोरेकस्थितयोज्ञीतव्यासझकटकंतयोः प्रीतिः ॥ . सूय्यॆनशुभविवलेनरस्यशुक्रेतयोद्वितययोः ॥ १० ॥ लग्नेश सप्तमेश पापयुत एकही स्थान में हों तो स्त्री पुरुष लडाई उपरान्त श्रीतिमान् होंगे जो सूर्य्य युक्त हों तो कलहमात्र होगा जो निर्बल उक्त -योगकर्ता हों तो दोनहूं रुष्टही रहेंगे ॥ १० ॥
पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/२४४
दिखावट