( २३२ ) ताजिकनीलकण्ठी । भावका स्वामी जो केंद्र में हो उसको मिलना चाहता हो तो बंधनसे शीघ्रही छूट जावे ॥ ३५ ॥ यावच्छुक्रोबलील तावत्कर्त्ता बलाधिकः ॥ ३६ ॥ अस्तंगतेतनौशु केबद्धमोक्षादिसंभवः ॥ यतेयेनयोगेनतेनयोगेन च्यते ॥ ३७ ॥ ु शुक्र लग्नमें हो तो वह शुक्र गोचरमें जबलौं उस राशिमें रहे इतनेही वीचळूट जावे जो शुक्र लग्नमें अस्तंगत हो तो वद्धमोक्ष होना संभव है वा जिसयोगसे मृत्यु होती है उससे बद्ध भी मोक्ष होता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ मेषेतुलेचशीघ्रंस्यात् कॅनक्रेसकष्टता ॥ स्थिरेचिराधिदेहस्थेमोक्षोमध्यमकालतः ॥ ३८ ॥ लग्नमें शुक्र१ । ७ का हो तो शीघ्र तथा ४|१० का हो तो कष्टसे स्थिर राशिका हो तो बहुत दिनों में द्विस्वभावका हो तो मध्यमकालमें छूटे शुक्र न हो तो लग्नहीसे यह फल कहना ॥ ३८ ॥ रोगप्रश्ने विशेषः । विलग्नेषष्टपः पापोजन्मराशिनिरीक्षते ॥ रोगिणस्तस्यमरणं निश्चयेनवदुधः ॥ ३९ ॥ षष्ठेश पापग्रह लग्नमें होकर जन्मराशिको देखे तो रोगीकी मृत्यु नि य पंडितने कहनी ॥ ३९ ॥ चतुर्थाष्टमगेचंन्द्रेपापमध्यगतेपित्रा || मृतिः स्याद्वलसंयुक्तेसौम्यदृष्टयाचिरात्सुखम् ॥ ४० ॥ चन्द्रमा ४ वा ८ में हो तथा पापग्रहोंके बीच हो तो रोगीकी मृत्यु हो वे जो उसे बली शुभग्रह देखें तो शीघ्र सुखी होजावे ॥ ४० ॥ विधौलग्नेस्मरभानौरोगीयातियमालयम् || नेकुरग्रहेलमेरोग वृद्धिश्चिकित्सकात् ॥ ४१ ॥ चन्द्रमा लग्नमें सूर्य्य सप्तम हों तो रोगी यमालय पहुँचे जो प्र में पापग्रह लग्नमें हो तो वैद्यसे रोगं बढे ॥ ४१ ॥ प्र
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