ताजिकनीलकण्ठी । विक्रीणाम्यमुकं वस्तुप्रश्न एवंविधेसति || आयस्थाने बलवति विक्रेतव्यं ऋयाणकम् ॥ ७॥ मैं यह वस्तु बेचताहूं कैसा होगा ऐसे प्रश्नमें आयस्थान वा तत्त्वामी बलवान् हो तो इस विकीमें लाभ अन्यथा हानि होगी ॥ ७ ॥ ७ इति श्रीमहीधरकृतायां प्रश्नतंत्रभापाटीकायां तृतीयभावप्रश्ननिरूप० ॥३॥ अथ चतुर्थस्थानप्रश्नः | (२१८) लग्नपतींदुचतुर्थपतिमुथशिलमथवागृहे गमनम् ॥ प्र : पृथ्वीलाभदम सौख्यदृग्योगतोनैव ॥ १ ॥ लग्नेश चन्द्रमा और चतुर्थेश परस्पर इत्थशाली वा एकही स्थान में होंतो प्रष्टाको भूमिलाभ होवे पापग्रहों से युक्त वा दृष्ट हों तो लाभ नहीं होगा, विशेष बलाबलसे फल कहना ॥ १ ॥ - यदि पृच्छति कृषिको मेक्षेत्राल्लाभो भवेन्नवा || लग्गंकृषिकस्तुय्यै भूमिद्यूनंच कृपिस्तरुदेशमम् ॥ २ ॥ खेतीवाला जो पूछे कि मेरी खेतीसे लाभ होगा वा नहीं तो लग्नं कृषि- कर्त्ता चतुर्थ भूमि सप्तम कृषि दशम अन्न वृक्षादि होते हैं इन भावोंके बला- बल निरूपण करके उक्त कामों में शुभाशुभ कहना ॥ २ ॥ लग्नेरोपगते स्यान्चौरोपद्रवस्तुकृषिकर्त्तुः ॥ वक्रातिचारवज्यैकरे चौरस्यकृषिलाभः ॥ ३ ॥ लग्नमें पापग्रह हों तो कृषिकर्त्ताको चौरादि उपद्रव होंगे जो वह पापग्रह वॅकी वा अतिचारी न हों तो चौरसे फिरभी लाभ होवे ॥ ३ ॥ 1 लग्नस्थे शुभखेटेसाफल्यंकर्षकस्य कृषितः स्यात् || भूमि प्रयात्येषः ॥ ४ ॥ लग्नमें शुभग्रह हों तो खेतीवालेको खेतीमें अच्छा लाभ होगा जो चौथा. पापग्रह हो तो समयपर खेती छोडकर भागजायगा ॥ ४ ॥ चूने च शुभोपगते शुभंकृपेस्त्वन्यथातुविपरीतम् ॥ दशमे दशमपतौ वा शुभयुतदृष्टेशुभा वृक्षाः ॥ ५ ॥
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