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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/२२२

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( २१४ ). • ॥ ३१ ॥ ताजिकनीलकण्ठी | चौरस्थानज्ञानम् | चौरज्ञानप्रश्नेलग्नेरविशशिदृशास्वगृहचौरः || अनयोरेकहशागृहसमीपवर्त्तीवसत्येषः ॥ ३० ॥ चौर कहां है पर सूर्य चंद्रमाकी दृष्टि हो तो प्रष्टाके घरहीमें और इनमेंसे एककी दृष्टि हो तो पढोसमें रहता है ॥ ३० ॥ लग्नस्थेलग्नपतावस्तपयुक्तेचगृहगतश्चौरः || अस्ताधिपतावंत्येसहजेवास्वीयभृत्योयम् लग्नेश लग्नमें सप्तमेशयुक्त हो वो चोर प्रष्टाके घरही में रहताहै, जो सप्तमेश बारहवाँ वा तीसरा हो तो चौर अपनाही नौकर है ॥ ३१ ॥ अस्तेशेतुंगस्थेस्वगृहेवातस्करः प्रसिद्धः स्यात् ॥ लग्नदशमा- स्तभावाः कमेणवीक्ष्याः स्वतुंगभवनादौ ॥ ३२ ॥ यःखेटः स्याद्व- लवान्स ज्ञेयस्तस्करस्यबली || लग्नादिषुयोग्रहः स्वोच्चादिब- लीसयज्जातिः ॥ एवंयोगंतुविनाघ्नेशस्यैवबलमभिग्राह्यम् ॥३३॥ सप्तमेश उच्चमें वा स्वगृहमें हो तो वह चोर नामी है कहना तथा १ ॥१०॥ ७ भाव क्रमसे देखने इनमें जो कोई उच्चादि बली हो वह चोरका बल जानना और उनके अनुसार फल कहना. जब ये योग न हों तो सप्तमही केवल लेना, बली ग्रहकी जातिरूपवाला चोर होगा वा चोरकी सहाय करेगा ३२|३३ इत्थंचौर [नेचौरः सूर्येगृहेश्वरस्यपिता || चंद्रेमाताशुक्रेमा- देसुतोभवे चे ॥ ३४ ॥ जीवेगृहप्रधानं भौमे त्रोथवा भ्राता ॥ `स्वजनोमित्रंवाज्ञात्वेत्थंपुण्यसहममावेश्यम् ॥ ३५ ॥ उक्त प्रकारोंसे चोर जाननेके और ज्ञान हैं कि वह योगकर्ता सूर्य्य हो तो उसघरके स्वायीका पिता चोरहै; एवं चन्द्रमासे माता, शुक्रसे स्त्री शनिसे पुत्र वा दास बृहस्पति घरका श्रेष्ठ मंगलसे पुत्र भाई बुध से, मित्र होगा ऐसा जानकर पुण्यसहम देखना ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ तस्मिन्क्रूराहष्टेपुरानचौरोस्तपेपुरापिस्यात् ॥ अस्तेशान्मूसरिफेभौमेचौरः पुरापिनिगृहीतः || ३६ || पुण्यसहम क्रूर दृष्ट न हो तो यह पहिले चोर नहीं था, सप्तमेश पाप- /