( २०६ ) ताजिकनीलकण्ठी । चंद्रमासे पक्ष हस्पतिसे महीने बुधसे ऋतु शनि से वर्ष जानने आधानके असव वा धनांदिप्राप्ति तथा गमन आगमन जयपराजय, शत्रुनाशादि कार्यो को इसप्रकार समय निश्चय करके कहना ॥४०॥ ४१ ॥ अकचटतपयशवर्गारविकुजसितसौम्यजीवसौराणाम् ॥ चंद्रस्य चनिर्दिष्टास्तैः थमोद्भवैर्वर्णैः ॥ ४२ ॥ ज्ञात्वातस्माल्लमं विज्ञायशुभाशुभंचवदेत् ॥ वर्गादिमध्यांत्यैर्वर्णैः प्रश्नोद्भवै विषमराशिः ॥ ४३ ॥ लाज्ञानेप्रवदेत्पृच्छायुग्मंकुजज्ञजीवा - नाम् ॥ सितरविजयोश्चनैकंरविशशिनोरेकराशित्वात् ॥ ४४ ॥ तस्मात्प्राग्वत्प्रवेदत्पृच्छासमयेशुभाशुभंसर्वम् || कालस्य विज्ञानादतञ्चित्यंबहुप्रश्ने ॥ ४५ ॥ अवर्गका स्वामी सूर्य्य एवं क का मंगल च का शुक्रट का बुध. त का हस्पति. प का शनि. य का चंद्रमा शकाभी चंद्रमा ये वर्गीके स्वामी हैं. जहां लग्नज्ञान न होसके वा २ | ३ आदि बहुत प्रश्न एक ही लग्नमें हों तो वर्गेशसे लग्न इसप्रकार लेनां कि, प्रश्न के प्रथमाक्षर वर्गके जो स्वामी हैं उनकी राशिलग्न जानना. उसलग्न से उक्तप्रकार योगादि विचारके शुभाशुभ फल कहना. प्रत्येक ग्रहकी २ | २ राशि हैं इनमें राशि जानना जैसे मंगल वर्गेश हो तो मेष समझना. चंद्रमाकी एकही है वह वही जाननी. जहां बहुत प्रश्न हों तो प्रथम प्रश्नमें प्रश्नाक्षरके प्रथम वर्ण दूसरे में मध्यवर्ण तीसरे अंत्यवर्ण से लग्न जानना तथा मंगल बुध बृहस्पतिके राशि लग्न ज्ञात हो तो दो प्रश्न जानना. शुक्रशनिसे अनेक. और सूर्य चंद्रमासे एक राशि होनेसे एकही प्रश्न जानना बहुत प्रश्नों में इसप्रकार लग्नसे शुभाशुभ फल तथा वर्गेश ग्रहके गुणकसे पूर्वोक्त क्रम में विचारकर सभी कहनां ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ प्रश्नवस्तज्ञाने । ● स्वांशेविल यदिवात्रिकोणेस्वांशस्थितः पश्यतिधातुचिंताम् || परांशकस्थश्चकरोतिजीवंसूलंपरांशोपगतः परांशम् ॥ ४६॥
पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/२१४
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