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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/२०२

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श्रीगणेशाय नमः अथ नीलकंठीप्रश्नतंत्रः प्रारभ्यते भूमिका | नीलकंठदैवज्ञकृत नीलकंठी तीन तंत्र की प्रथा है परन्तु तीसरा मश्चतन्त्र केवल नीलकंठाचार्य्यकृत सांगत में समय प्रभाव के कारणांतरोंसे दुष्णाप्य है, जन्मविचारवैपयिक ग्रंथ बृहज्जातक एवं वर्षपयिक ताजिकनीलकंठी दो तंत्रोंके भापाटीका सर्वसाधारणके प्रसन्नतानिमित्त यथामति बनाये उपरांत तदनुगामी प्रश्नप्रकरण जो कि, जातक ताजिक ग्रन्थ देखनेवालोंको अवश्यही उपयोगी है. यद्यपि उक्तजातक ताजिकों में बहुधा यही विचार प्रश्नमें भी करना लिखनेसे प्रश्नग्रंथका अंतर्भाव अर्थात् प्रश्नग्रंथका प्रयोजन उन्हीमें आलिया, तथापि पूर्वाचार्यो में शिष्टाचार एवं प्रकटताके लिये अनेकानेक ग्रन्थ नीलकंट- मतानुसारी होनेसे नीलकंटीनाम भया है, चमत्कारी प्रश्नमंथकी भाषाटीका यथामति करताहूं सज्जनजन स्वीय सौजन्यतासे अंगीकार करें, संस्कृत विद्या अद्वितीय है कोई वस्तुमात्र इससे रहित नहीं है जो रहित हो वह चतुर्दश भुवनमें हैही नहीं परन्तु भारतवर्ष में विद्या के नाश होनेका मुख्य कारण यही है कि जो लोग कोई अनूठी विद्या वा कला एवं औषधि मन्त्र आदि चमत्कृत जानते हैं वे दूसरे को सिखलानेमें मत्सरी होकर प्रकट नहीं बतलाते, उनके देहांत समय में वह उन्हीके साथ गई आगे विचा कहांसे बढ़े ! इस वातको विचार मैंने बृहज्जातक एवं नीलकंठी तीनहूं तंत्रों में ज्योतिषशास्त्र में जो बहुधा संकेत रहते हैं वे यथावकाश प्रकटही करदिये हैं । अनुष्टु० - दैवज्ञस्यहि दैवेन सदसत्फलवां या || अवश्यं गोचरे मर्त्यः सर्वः समुपनीयते ॥ १ ॥ प्राक्तन कर्मको देव कहते हैं जैसा मनुष्यने कर्म किया वैसेही फलभी अ- • • वश्य पावैगा उसके शुभाशुभ परिपाक के जानने की इच्छा दैवज्ञकी हो तो यह गोचर अर्थात यहचारसे सम्पूर्ण कहसकता है ॥ १ ॥