(१९२ ) ताजिकनीलकण्ठी । शुक्रसे जौ, बाजरा आदि शनिसे कुलत्य कैथ नक्का खिसरी उड़द आदि राहु केतुसे कोदों कांगनी सामा आदि भूसी सहित (. बेछाँटे ) अन्न मिले ये प्रधान अन्न हैं. उक्तान्न आदि भोजन मिलेंगे कहना. उस ग्रह- पर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो शीसे पापयुत दृष्टि हो तो सकोप ( कलहा- दिसे ) भोजन होवे ॥ ४६॥ 9 सूर्येमूलंपुष्पमिन्दौकुजेस्यात्पत्रंशाखाचापिशाकंसवीर्ये ॥ शुक्रेज्यज्ञैव्यंजनंभूरिभेदमन्देनेत्थंसामिषंराहुकेत्त्वोः ॥ ४७ ॥ भोज्यरूप सूर्घ्य हो तो मूल ( जडका ) शाक चन्द्र हो तो पुष्प कुज हो तो पत्ता और डार शुक्र गुरु निष्पाप बुध हों तो अनेक तरहके व्यंजन शनि राहु केतु हो तो मांस वा तेलकी बनी तरकारी मिलै ॥ ४७ ॥ अथ स्वप्नचिन्ता | शालिनी०- लग्नांशगेकै तनुगेपिवास्मिन्दुःस्वप्नमीक्षेतयथार्कविवम् ॥ रक्तांबरं वह्निमथापि चंद्रे शुभ्राश्वरत्नांबरपुष्पवत्रम् ॥ १८ ॥ अब स्वमविचार दिनप्रवेश वा प्रश्नलव से कहते हैं कि जो सूर्य लग्न वा -लग्ननवशांकमें हो तो इस दिन दुःस्वम देखेगा जैसे स्वममें सूर्ग्यबिंब रक्त वस्त्र अथवा अग्नि देखे चंद्रमा हो तो श्वेत रंग घोड़ा वच पुप्प हीराआदि देखे४८ उपजा: - स्त्रियः सुरूपाश्च कुजे सुवर्ण रक्तांबरखपशुविद्रुमाणि ॥ बुहयः स्वर्गतिधर्मवार्ता गुरोरतिर्धर्मकथा सुरेक्षा ॥ ४९ ॥ चंद्रमा हो तो सुरूप स्त्री भी देखे. मंगल हो तो सुवर्ण रक्तवत्र रक्तपुष्प मुर्ख रंगके पशु और मूंगा आदि. बुध हो तो थोडा और स्वर्गगमन वा स्वर्ग- सम सुख तथा धर्मसंबंधि वार्ता बृहस्पति हो तो अपने प्रीत्यनुसार वस्तु धर्मसंबंधि कथा और देवताओंका दर्शन देखे ॥ ४९ ॥ उपजा० सांबुसंगश्च सितेजलानां पारेगतिर्देवरतिर्विलासः ॥ शनावरण्याद्विगतिश्चनीचैः संगश्च राहौ शिखिनीत्थमेव ॥ ५० ॥ शुक्र हो तो सुबांधवोंका संगम तथा जलोंको तिरके पारगति देवताओंसे प्रीति विलासादि सुख देखे. शनि हो तो वन पर्वत गमन नोचजन संगति होवे राहु केतुकाभी ऐसाही फल है ॥ ५० ॥
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