(१८४) ताजिकनीलकण्ठी । कार्य है तहां मासदिन ३० से कार्य करना अन्यत् उसी रीतिसे मास प्रवेशकी दशा होती है,इसका प्रकट विवरण दशांविधिमें प्रथम लिखा है. तैसेही अंतर्दशा गिननी चाहिये इनके अनुसार उच्च नीचादि बलाबल विवेकसे फल हना दशाभी अनेक प्रकारकी हैं, जैसे प्रात्यांशी १ मुद्दा २ देवकीर्तिमत हृद्दादशा ३ अनेक भेदसहित तासीरदशा ४ निसर्गदशा ५ कालहोरा ६ लग्नादि राश्यादि. ग्रहदशा ७ भोग्यांशदशा ८ महादेवमतदशा ९ बलभद्रमताख्या १० गौरी- मताख्या ११ राममताख्या १२इन विशेष विस्तार ताजिक मुक्तावलीमें है. यहां ग्रंथभ्यस्त्व भयसे केवल प्रधान अंशदशाही आचार्ग्यने कही है. मास- दशादिनादिज्ञानार्थ उपाय यह है कि मुंथा और मासलग्नमें से जो बलवान हो उस राशिमें जो भौमादि हृद्दास्वामी हैं वे अपने अपने अंशतुल्य दिन पाते हैं, जैसे वर्षलग्र स्पष्ट देखना 'मेपेंगतर्का •' इत्यादिसे जो हृद्देश हैं वह प्रथम दशास्वामी तदनंतर क्रमसे होंगे, जैसे राशिक ३० अंश हैं इन्हें १२ से गुनाकर ३६० होते हैं ये सौरदशा दिन हैं तदवही जितने ह्रद्दांशहों उन्हें १२ से गुनाकर भौमादिकों के दशादिनादि होते हैं प्रथम दशेशके भुक्तांश और ओग्यांश पृथक् १२ से गुनाकर भुक्त और योग्य दशादिनादि होते हैं भुक्तदिनादि दशाके अंत्यमें आवेंगे यह देवकीर्तिमतसे हृद्दादशा प्रकार है इसी रीतिसे दिनप्रवेशमेंभी करना पात्यांश दशा उसीके उक्तकारसे है ॥ १४ " अनुष्टु० - रवींद्रोरसमावेशान्नैतद्युक्तंपरेजः ॥ दशांतरदशाब्देशफलमाब्दंत युज्यते ॥ १५ ॥ जो किसीके मतसे सूपं चंद्रसा और लग्नकी छोड़ दीहै यह प्रमाण नहीं है दशांतरदशाओंका फल वर्षोकही है तो यह भी दशामें होनेही चाहिये इसलिये पात्यांश मुद्दही मुख्य है ॥ १५ ॥ इति श्रीमहीधरकृतायां नीलकंठीभाषाटीकायां मासप्रकरणम् ॥१५॥ अनुष्टु० - दिनप्रवेशकालेपिग्रहान्भावांश्चसाधयेत् ॥ चंद्रलमांशकाभ्यांतुफलंतञवदेदुधः ॥ १६ ॥ दिनप्रवेश के लिये वर्षके तात्कालिक सूर्य स्पष्टमें जितना संख्याक 1
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