भाषाटीका समेतां । (१७७) · देते हैं पूर्ण चन्द्रमा शुभयुक्तभी यही फल देता है और पापग्रहयुक्त चन्द्रमा धनस्थान में धनहानि देता है विशेषतः शमि तो राजासे भय और कार्य- नाशमी करता है ॥ ५१ ॥. वसन्तति • दुश्चिक्यगाः खलखगा धनधर्मराज्यलाभप्रदा ब. लयुताः क्षितिलाभदाः स्युः ॥ सौम्याः सुखार्थव लाभयशो- विलासलाभाय हर्षमतुलं किल तत्र चन्द्रः ॥ ५२ ॥ तृतीयभावमें पापग्रह धन धर्म और राज्यसुख देते हैं बलवान् हों तो भूमिलाभभी करते हैं शुभग्रह सुख धनलाभ कार्म्यसिद्धि यश विलासादि सौख्य करते हैं और चन्द्रमा अनुपम हर्ष देता है पूर्ण क्षीणका यहां उपचय होनेसे अपेक्षा नहीं है ॥ ५२ ॥ 0- वसन्तति • - चन्द्रः सुखेख लयुतोव्यसनंरुजंचपुष्टश्शुभेनसहितः सुखमातनोति ॥ सौम्यः सुखंविविधमत्रखलाः सुखार्थनाशंरुजं व्यसनमप्यतुलंभयं वा ॥ ५३ ॥ चतुर्थभाव में चंद्रमा सुख देता है पापयुक्त हो तो द्यूतादि व्यसन और • रोग करता है शुभयुक्त पूर्ण हो तो सुख देता है और शुभग्रह अनेक प्रकार सुख देते हैं, पापग्रह सुख और धनका नाश तथा रोग व्यसन वा अनुपम भय देतेहैं ॥ ५३ ॥ स्थोद्ध० - त्रवित्तसुखसंचयंशुभाः पुत्रगा भृ सुतोतिहर्षदः ॥ पुत्रवित्तधनबुद्धिहारकास्तस्करामयकलिप्रदाः खलाः ॥ ५४ ॥ पंचम भाव में शुभग्रह पूर्ण चन्द्रमा पुत्र धन और सुख बढ़ाते हैं शुक्र तो . अतिही हर्ष देता है पापग्रह पुत्र मित्र धन तथा बुद्धिहरण और चौरसंबंधि व्यसन रोग कलह करते हैं ॥ ५४ ॥ शालिनी-पष्टेपापावित्तला भंसुखाप्तिंभौमोत्यंतहर्षदः शत्रुनाशम् || सौम्या भीतिवित्तनाशंकलिंचचंद्रोरोगं पापयुक्तः करोति ॥ ५५ ॥ छठे भावमें पापग्रह धनलाभ सुखप्राप्ति करते हैं मंगल अतिहर्ष तथा श त्रुनाश करता है शुभग्रह भय धननाश कलह करते हैं पापयुक्त चन्द्रमा रोगो- त्पत्ति करताहै ॥ ५५ ॥
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