भाषाटीकासमेता । (१५७ ) वर्षेश शनि अधिकारी होकर तीसरे वा नौवें स्थानमें हो तो पापनाशद्वारा धर्मवृद्धि होवे ॥ ७ ॥ अनुष्टु० - अस्मिन्दग्धेविनष्टेचपापकृद्धर्मनिंदकः ॥ ईदृशीहक्फलंयँगुरावित्थंनयार्थभा ॥ ८ ॥ तथा अधिकारी वर्षेश शनि दग्ध वा नष्ट हो तो इस वर्ष में पाप करने वाला तथा धर्मकी निंदा करनेवाला होवे ऐसा ही वर्षेश सूर्य अधिकारी वर्ष में तीसरे वा नवम स्थान में हो तो ऐसाही फल होताहै, और ऐसेही वर्षेश बृहस्पति अधिकारवान् ३ | ९ स्थानमें नट वा दग्ध हो तो न्यायसे द्रव्यप्राप्ति होती है ॥ ८ ॥ अनुष्टु० -तत्रस्थासुथहा ण्यागमंपापंखलाश्रयात् || सतौखेशेर वौखस्थेवर्षेमुथशिलंयदि ॥ ९ ॥ मुंथा तीसरे नववें स्थानमें पुण्यागम करती है और इन्हीं स्थानों में पापयुक्त मुंथा हो तो पापकी प्राप्ति करती है और जन्मका दशमेश सूर्य्य वर्षमें दशम हो बलवान् भी हो तथा ( मंदगामी ) लग्नेशसे इत्थशाली भी हो तो अपने बलके अनुसार राज्यप्राप्ति करता है ॥ ९ ॥ · अनुष्टु० - ल घेपेनराज्यातिरुक्ता वीर्य्यनुमानतः ॥ धर्मकर्माधिपौदग्धौधर्मराजक्षयावहौ ॥ १० ॥ ·लमेश बलवान् होने में इसके बलानुसार राज्यप्राप्ति होती है और नवमेश एवं दशमेश दग्ध वा पापपीडित हो तो धर्म तथा राज्यको क्षय करते हैं. यहां दशमभाव राज्यसहम कर्मसहम और लग्न तथा इनके स्वामी बलवान् और शुभग्रहों के साथ होनेमें शुभ फल तथा वकदग्धादि निर्बल और पापयुक्त होनेसे अशुभ फल देते हैं यह विचार विशेष है ॥ १० ॥ इतिश्रीमहीधरकृतायां नीलकंठीभाषाटीकायां दशमभावकलाध्यायः ॥ १० ॥ अथ भावविचारः । अनुष्टु० - अब्दपे थेगेलाभो वाणिज्याच् भहग्युते || सथिहेसि ते लाभः पठनलेखनात् ॥ १ ॥
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