(१४६ ) ताजिकनीलकण्ठी । व०ति ० - जन्मास्तपेव्दपसितेनयुगीक्षितेस्यात्स्त्रीसंग सोवहुवि लाससुखप्रधानः || केन्द्रत्रिकोणगगुरोजनिशुक्र भस्थेस्त्रीसौ- ख्यमुक्तमितिहद्दविवाहयोश्च ॥ ७ ॥ जन्मका सप्तमेश वर्ष में शुक्रसे युक्त या दृष्ट किसी स्थानमें हो तो स्त्रीसं- गम बहुत विलास हास सुखपूर्वक होवे १, जन्मको शुक्र जिस राशिमें हो उसमें वर्षका बृहस्पति लग्नसे केन्द्र वा त्रिकोण हो तो स्त्रीमुख होवे २, वर्षलग्नकी हद्दाका स्वामी जन्मकी शुक्रराशिमें वर्पलग्नसे केन्द्र त्रिकोण में हो तो स्वीसौख्य होवे ३, ऐसा ही वर्षका विवाहसहमस्वामी, जन्मके शुक्रराशिका वर्षलग्नसे केन्द्रनिकोणमें हो तो स्वीमाप्ति होवे ये चार योग हैं ॥ ७ ॥ अनुष्टु० - अधिकारिपदस्थेस्त्रीभ्योव्याकुलतानिशम् || इथिहाधिकृतस्थानेगुरुदृष्ट्याविवाहकृत् ॥ ८ ॥ पंचाधिकारियोंमेंते किसीकी राशि सूर्य हो तो स्त्रियोंसे नित्य व्याकुलता रहे, एवं मुंयेशकी राशिका बृहस्पति हो वा मुंथाकी राशिमें बृहस्पति हो वा मुंथा राशिको बृहस्पति देखें तो विवाहयोग कहा है ॥ ८ ॥ अनुष्टु० - इंथिहार्कारयुग्नेॠरितेसहमेलियाः ॥ स्त्रीपुत्रेभ्यो भवेत्कष्टं पापष्टया विशेषतः ॥ ९ ॥ सूर्य्य मंगलके साथ युंथा सतम स्थान में हो तथा स्त्रीसहम पापाक्रांत होवे तो स्त्रीसे एवं पुत्रसे कष्ट होवे पापग्रहकी दृष्टि भी उसपर हो तो स्त्रीपुत्रोंसे अधिक ही कष्ट होगा ॥ ९ ॥ अनुष्टु॰—सूतौद्यूनाधिपः शुक्रोदेनेवलवान्भवेत् || लग्नेशेनेत्यशालश्रेस्त्रीलासंकुरुते सुखम् ॥ १० ॥ जन्मका सप्तमेश शुक्रवर्षमें बलवाव होकर सप्तम स्थानमें हो तथा लग्ने सके साथ इत्थशालीभी हो तो पूर्वी होवे ॥ १० ॥ अनुष्टु० - भौसेव्दपेसितदृशाशुक्रव्देशेकुजेक्षया || तहटेदारसहमेस्ट्रीलाभो भवतिभुवम् ॥ ११ ॥
पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/१५४
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