भाषाटीकासमेवा । (१३७) चतुर्थ स्थानमें पापयुक्त वा पापदृष्ट सूर्य्य हो तो पिताको और ऐसाही चंद्रमा हो तो माताको पीड़ा करता है. जो सूर्य्य चंद्रमा साथही चतुर्थ हों चा सूर्य्य चंद्रमा पापयुक्त दृष्ट हों तो पिताको पीडा देते हैं और जन्ममें सूर्य जिस राशिकाहै वर्ष में उस राशिका शनि हो तो अपमान होवे तथा पिताके -साथ कलह वैर होवें ॥ १ ॥ उपजा० - चंद्रेजनन्येवसुशंतिबंधौसुखाधिपे ीतिसुखानिपित्रोः ॥ तुर्य्याधिपेल पतीत्थशालेवयिन्वितेसौख्यमुशंतिपित्रोः ॥ २ ॥ जन्ममें चंद्रमा जिस राशिमें है वर्षमें उस राशिका शनि हो तो मातासे वैर तथा कलह होबे, चतुर्थ स्थानका स्वामी चतुर्थहीमें हो तो मातापिताके साथ श्रीति तथा उनका सुख कहते हैं, उपलक्षणसे पितृ वा मातृ सहम भी चतुर्थ होनेमें यही फल देता है तथा चतुर्थेश चतुर्थभावको देखे तो पितृ मातृ- · सुख देता हैं और बलवान् चतुर्थेश लग्नेशसे इत्थशाली हो तो पितृ मातृ सुख होवे उपलक्षणसे लग्नेश चतुर्थेशका योगभी उक्तफल देनेवाला होता है ॥ २ ॥ व०ति० - सौख्याधिपोजनुषिनष्टबलोब्दसूत्योः पित्रोरनि दथोसहमेशयोस्तु ॥ दग्धेतुरीयगृहगेचयदींथिहायांनाशस्तयोः सहमयोरपिदग्धयोः स्यात् || ३ || - जन्मका चतुर्थभावेश वर्ष तथा जन्ममें बलहीन हो तो माता पिताको अशुभ फल करता है ऐसाही मातृपितसहममें भी विचारना तथा इन सह- मोंमें दग्ध पापग्रह हों और मुंथासे चतुर्थ पड़ें तो पिता माताका नाश होवै तथा मातृ पितृ सहमोंके स्वामी नष्टबल वा पापाक्रांत और अस्तंगत हो तो यही फल देते हैं सुखेश वा उक्त सहमेश बली हों तो मातापिताको शुभ फल देतेहैं ॥ ३ ॥ अनुष्टु - जन्मन्यंबुगृहंयञ्चतत्पतिस्तत्पदोपगौ || शन्यारौक्केशदौपित्रोर्नचेत्सौम्यनिरीक्षितौ ॥ ४ ॥ जन्ममें चतुर्थभाव और चतुर्थेश के आश्रितराशियोंमें शनि और मंगल बैठे होंय तो माता पिता को लेश करते हैं पापदृष्ट भी हों तो अधिक श
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