( १३४ ) ताजिकनीलकण्ठी | 4 जन्ममें बृहस्पति धनभावका स्वामी हो और वर्षमें वर्षेश हो जाय तो जिस भाव में बैठा हो उस संबंधी लाभ देता है, जैसे उक्त बृहस्पति लग्नमें हो तो अपने पुरुषार्थ से लाभ देता है और आत्मनः- शरीरको सुख देता है ॥ १५॥ अनु. ० - वित्ते सुवर्णरूप्यादेर्भ्रात्रादेः सहजक्षेगः ॥ पितृमातृक्षमादिभ्योवित्तंसुहृदि पंचमे ॥ १६ ॥ उक्त कार बृहस्पति धन स्थानमें हो तो सुवर्ण रौप्यादि लाभ हो ती- सरा हो तो भ्रातादिकोंसे, चौथा हो तो पिता माता वा उनके सदृशोंसे 'पंचमे' इसका अर्थ दूसरे लोकार्थ में है ॥ १६ ॥ • अनुष्टु० - सुहृत्तनयतः पष्टेरिवर्गाद्धानिभीतिदः || स्त्रीभ्योद्यूनेष्टमेमृत्युरर्थहेतस्तथांकगे ॥ १७ ॥ और पंचम होने मित्र वा मित्रपुत्र वा आत्मपुत्रसे धनलाभ और छठा हो तो शत्रुवर्गसे धनहानि और भय देता है. सातवें हो तो स्त्रियोंसे धन देता है, आठवें हो तो मृत्युतुल्य धनक्लेश देता है, नववें हो तो अनेक प्रकारसे धन देता है ॥ १७ ॥ 1 अनुष्टु० - खेनृपादेर्नृपकुलादायेंत्येव्ययदो भवेत् || इत्थंविमृश्यसुधियावाच्यमित्यपरेजगुः ॥ १८ ॥ दशवें हो तो राजा मंत्री आदिकोंसे ग्यारहवां हो तो राजकुलसे धन देता है. बारहवां हो तो व्यय देता है. बुद्धिमानोंने इस प्रकार विचारके फल कहना, ऐसा और आचार्य्यभी कहते हैं ॥ १८ ॥ ० इति महीधरकृतायां नीलकंठीभाषाटीकायां फलतंत्रे वनभावविचाराध्यायः २ ॥ अथ सहजभावविचारः । अनु· ० - अब्देशकैसितेवापि सबलेपापवर्जिते । सौख्यंमिथः सोदराणां व्यत्ययाद्वयत्ययंवदेत् ॥ १ ॥ वर्षेश सूर्य्य अथवा शुक्र जलवान हो तथा पापग्रहों से युक्त न हो तो परस्पर भाइयोंका सुख होवे. जो पापग्रहयुक्त होतो विपरीत फल कहना अर्थात् भाइयों के साथ परस्पर कलहादि उपद्रव होवें ॥ १ ॥
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