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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/१३५

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भाषाटीकासमेता । (१२७) • जा० - त्रिषष्टलाभोपगतैरसौम्यैः केंद्रत्रिकोणोपगतैश्चसौम्यैः॥ रत्नांबर स्वर्णयशः सुखातिर्नाशोप्यानिष्टस्यतनोश्च ष्टिः ॥ ६ ॥ पापग्रह तीसरे छठे ग्यारहवें स्थानों में हों तथा शुभग्रह केंद्र वा त्रिकोण - गर्ने हों तो रत्न वस्त्र सुवर्ण यश और सुख मिलें और पूर्वोक्त आरेष्टका नाश होवे तथा शरीरमें पुष्टिभी होवे ॥ ६ ॥ उ० जा० - यदासवीर्य्योसुथहाधिनाथोल धिपोजन्मविलग्रपोवा || केंद्र त्रिकोणायधनस्थितास्तेसुखार्थहेमांबरलाभदाः स्युः ॥ ७ ॥ जो मुंथेश वा लग्नेश अथवा जन्मलग्नेश पूर्ण बली होकर केंद्रत्रिकोण वा ग्यारहवें वा द्वितीय स्थान में से किसीमें हों तो सुख तथा धन सुवर्ण वस्त्र देतेहैं तीनों ऐसे हों तो विशेषतर उक्त लाभ देतेहैं ॥ ७ ॥ उपजा० -तुंगेशनिर्वाभृगुजोगुरुर्वाशुभेत्थशालाद्यवनाद्धनाप्तिम् || बली जो वित्तगतोयशोथेंतेजांस्यकस्मा सुखानिदद्यात् ॥ ८ ॥ शुभग्रहसे इत्थशाली उच्चराशिका शनि वा शुक्र अथवा बृहस्पति हो तो श्रेष्ठ यवनसे धनलाभ होवे शनियोगसे और शुक्रकृत योग हों तो स्त्रीसे और गुरुकृत योग हो तो ब्राह्मणसे यवनातू के माने यवनादि ग्रहानुसार जाति- योंसे जो तीनों उक्त ग्रह उच्चवर्ती तथा शुभ ग्रहेत्थशाली हों तो यवन रा- जासे बहुत धन मिले औरनसे थोडा २ और बलबान् मंगल धनस्थान में हो तो यश धन और तेज मिलें तथा अकस्मात् सुखभी प्राप्त होवे ॥ ८ ॥ इंद्रव० - सूर्य्योज्यशक्रामिथइत्थशालं युस्तदाराज्ययशः सुखार्थाः ॥ सूर्यः जोवोपचयेददातिभद्रयशोमंगल मिथिहायाः ॥ ९ ॥ O सूर्य बृहस्पति शुक्र परस्पर इत्यशाल करें तो राज्य यश सुख और धन- मिलें १ तथा सूर्य वा मंगल मुंथासे उपचय ३।६।१०।११ स्थानमें हों तो कल्याण अतियश और मंगल देते हैं ॥ ९ ॥ अनुष्ट ० - शकज्ञचंद्राहस्वेपापारुयायगतायदि ॥ स्वबाहुबलतोहेमसुखकीर्तिनरोश्नुते ॥ १० ॥ शुक्र बुध और चन्द्रमा अपनी हद्दामें हों और पापग्रह तीसरे ग्यारहवें स्थानमें हों तो मनुष्य अपने बाहुबलसे सुवर्ण सौख्य और कीर्तियोंका भोग करता है १०