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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/१३४

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( १२६ ) ताजिकनीलकण्ठी । अथारिष्टभंगाध्यायः | अनुष्ट० - लग्नाधिपोवलयुतःशुभेक्षितयुतोपिवा || केंद्रत्रिकोणगोरिष्टंनाशयेत्सुखवित्तदः ॥ १ ॥ पूर्वोक्त आरष्ट योगोंके परिहारार्थ अरिष्टभंग योग कहते हैं कि वर्षल स्वामी बलवान् पंचवर्गीमें १५ से अधिक बली हो शुभग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तथा केन्द्र १ । ४ । ७ ११० वा त्रिकोण ५ | ९ में हो तो पूर्वोत्त दुष्ट योगोंका आरेष्टफल नाश करके सुख और धन देता है ॥ १ ॥ • अनुष्टु० - गुरु: केंद्रे त्रिकोणेवापापा : शुभेक्षितः || लगचंद्रे थहारिष्टंविनाश्यार्थसुखं दिशेत् ॥ २ ॥ बृहस्पति केंद्र वा त्रिकोणमें शुभ ग्रहोंसे दृष्ट हो और इसपर पापग्रहको दृष्टि न हो तो लग्न चन्द्रमा और मुन्थाजन्य पूर्वोक्त अरिष्टका नाश और सुखप्राप्ति कहना ॥ २ ॥ अनुष्ट० - सुखस्वामियुतंसद्भिर्ट सौख्ययशोदम् || लग्नेतृतीयेऽथगुरुर्जन्मेट्सौख्यार्थदः सुखे ॥ ३ ॥ चतुर्थभाव अपने स्वामीसे युक्त तथा शुभग्रहसे दृष्ट वा युक्त हो तो यश और थन देता है और बृहस्पति लग्न वा तृतीय स्थानमें तथा जन्मलमेश सुख ४ स्थानमें हो तो सुखपूर्वक धन देता है ॥ ३ ॥ उपजा०-लग्नेद्युनेशस्तनुगः सुरेज्यः रैरदृष्टःशुभमित्रदृष्टः || रिप्ष्टं निहत्यर्थयशःसुखाप्तिं दिशेत्स्वपाके नृपतिप्रसादम् ||४|| सप्तमेश लग्नमें बृहस्पतिके साथ हो क्रूरग्रह इसे न देखें शुभग्रह तथा मित्र- ग्रहोंसे दृष्ट उपलक्षणसे युक्तभी होवे तो आरष्टको नाशकर धन यश और सुख देताहै तथा अपने दशामें राजप्रसादमी देगा कहना ॥ ४ ॥ उपजा० - चलान्वितौ वर्मधनाधिनाथोकरदृष्टौ तनुगौ यदास्ताम् । राज्यं गजाश्वांवररत्नपूर्णरिष्टस्यनाशोप्यतुलं यशश्च ॥ ५ ॥ नक्मेश तथा धनभावेश बलवान् और लग्नमें हों पापग्रह इन्हें न देखें त्वो हाथी बोडा बस्न रत्नोंसे पूर्ण राज्य मिले तथा अरिष्टका नाश हो और अनुपम यशभी होवे ॥ ५ ॥