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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/१३२

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ताजिकनीलकण्ठी । ॥ "" व्ययांबुनिधनारिस्थाजन्मेशाब्दपमुंथहाः एक क्षेगास्तदामृत्युः पापक्षुतदृशा ध्रुवम् ॥ १३ ॥ जन्मलग्रेश वर्षेश और मुंथा तीनों बारहवें चौथे आठवें और छठे स्थानों में से किसीमें साथही हों तो मृत्युतुल्य कष्ट होवे, जो इनपर पाप, ग्रहोंकी क्षुतारूप दृष्टि भी हो तो अवश्य मृत्यु ही होगी ॥ १३ ॥ अनुष्टु० - चंद्राव्ययेशनियुतः शुक्रः षष्टोर्थनाशकृत् || चित्तवैकल्यमशुभेसराफात्रशुभेक्षणात् ॥ १४ ॥ शनिके साथ चंद्रमा बारहवाँ हो और शुक्र छठा हो तो धननाश करता है और शनि शुक्र के साथ किसी पापग्रहका ईसराफ योग हो तो चित्त विक- ल रहै, इनपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो धननाश तथा चितवैकल्प दोनों फल होवें ॥ १४ ॥ ( १२४ ) अनुष्ट० - चंद्रोर्कमंडलगतोरिपुरिः फाष्टबंधुगः ॥ त्रिदोपतस्तस्यरुजाविबुधेज्यदृशा शुभम् ॥ १५ ॥ चन्द्रमा अस्तंगत होकर छठे, बारहवें, आठवे, वा चौथे, स्थानमें हो तो ( त्रिदोष ) वात पित्त कफके विकारसे सन्निपातादि रोग होवें जो इस पर बृहस्पति की दृष्टि होजाय तो परिणाममें नीरोगी होजायगा ॥ १५ ॥ अनु ० - हद्दाहायनलग्नेशौ सप्ताष्टांत्येखलान्वितौ ॥ स्वदशायां निधनदौ शुभदृष्ट्या शुभं वदेत् ॥ १६ ॥ लग्नमें जिसकी ह्रद्दा तत्काल हो वह और लग्नेश सप्तम अष्टम वा बारहवें पापयुक्त हों तो अपनी दशामें मृत्यु देते हैं इनपर शुभग्रहकी दृष्टि भी हो तो रोग भोगकर परिणाममें सुख होगा कहना ॥ १६ ॥ अनुष्ट ० -- अब्दलग्नाहज्वनृजूव्ययार्थस्थौरुजातदा || एवंवर्पाब्दलग्नेशजन्मेशैरपिबंधनम् ॥ १ ॥ वर्षलश से बारहवां मागग्रह द्वितीय स्थानमें वक्री ग्रह हो तो रोग होता है इसका नाम कर्त्तरयिोग है, ऐसेही जन्मलग्नेश वा वर्षलग्नेश वा वर्षेशसे कर्त्तरी हो तो बंधन कहना और सप्तम स्थानपर भी कर्त्तरीयोग रोग वा दुष्ट उपद्रवोंसे बंधन देता है ॥ १७ ॥