( १२० ) ताजिकनीलकण्ठी | उपजा० - ये जन्मकाले बलिनोन्दकालेचेद्दुर्बलास्तैरशुभं समांते ॥ विपर्ययेपूर्वमनिष्टमुक्तं तुल्यंफलंस्यादुभयत्रसाम्ये ॥ ३३ ॥ जो ग्रह जन्म लिमें बलवान् और वर्षाकालमें निर्बल हो वह वर्षके पूर्वार्द्ध में शुभ और वर्षके उत्तरार्द्ध में अशुभफल निर्बलताका देते हैं इनसे विपरीत अर्थात् जो जन्ममें निर्बल और वर्षमें बलवान् हैं वे वर्षपूर्वार्द्ध में अशुभ उत्तरार्द्ध में शुभ फल देतें हैं दोनों कालमें तुल्यही हों तो सम्पूर्ण वर्ष में तुल्यही फल देते हैं ॥ ३३ ॥ उपजा॰—षष्टेष्टमेंत्येभुविवँथिहेशोस्तगोथवको शुभदृष्टयुक्तः ॥ क्रूराच्चतुर्थास्तगतश्च भव्योनस्याद्रुजंयच्छतिवित्तनाशम् ॥ ३४ ॥ मुंथाका स्वामी छठे आठवें बारहवें वा चौथे स्थान में हो अथवा अस्तं- गत हो वा वक्री हो तथा पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो अथवा क्रूर ग्रहसें चौथा वा सप्तम अर्थात् शत्रुदृष्टिमें हो तो शुभ फल देनेवाला नहीं होता है और रोगोत्पत्ति धननाशभी करता है ॥ ३४ ॥ उप० - यद्य मेशेनयुतोथह क्षुताख्यदृष्टयान भस्तद पे ॥ योगद्वयेस्यान्निधनंयदै कयोगस्तदा मृत्युसमत्वमा : ॥ ३५ ॥ जो मुंथेश वर्षलग्नसे अष्टमेश युक्त अथवा १ | ४ | ७|१० क्षुत दृष्टिसे दृष्ट हो तोभी शुभफल नहीं देता, एक योग यहहै एक योग पहिले श्लोक ( षष्ठेष्टमेंत्ये ) इत्यादिमें कहा है जिस वर्षमें ये दोनों योग होवें तो मृत्युफल देतेहैं जो एकही हो तौ भी मृत्युसमान कष्ट देता है ॥ ३५ ॥ (अनुष्ट - थहातत्पतिर्वापि जन्मनीक्षितयुक्छुभैः || वर्षांरंभेशुभंधत्तेऽब्देचेदंत्येन्यथाशुभम् ॥ ३६ इति नीलकंठयां फलतंत्रेमुथहाफलाध्यायः ॥ २ ॥ जो जन्मकालमें मंथा वा मुंथेश शुभग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो पूर्वार्द्ध में . शुभ फल देता है मुन्था पुन्थेश दोनों शुभग्रहयुक्त वा दृष्ट हों तो अतिशुभ फल वर्षांपूर्वार्द्ध में देते हैं तथा बर्षकालमें मुंथा वा मुंथेश शुभग्रह युक्त वा हों तो वर्षके उत्तरार्द्ध में शुभफल देते हैं तथा मुंथा मुंथेश दोनों शुभ-
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