भाषाटीकासमेता । (११९) . मुंथा बृहस्पतिसे युक्त वा दृष्ट तथा गुरु राशि ९ । १२ में हो तो पुत्र तथा स्त्रीका सुख और रत्न व धर्मका देती है शुभग्रह से इत्थशालि - नोभी हो तो कुलानुमान राज्य मिलता है ॥ २८ ॥ · उप० - शनेगृहेतेनयुतेक्षितावायदीथिहावात रुजंविधत्ते ॥ यानक्षयंवह्निभयंधनस्यहानिचजीवेक्षणतः भाप्तिम् ॥ २९ ॥ मुंथा शनिकी राशि १० |.११ में यद्दा शनिसे युक्त वा दृष्ट हो तो वात संबन्धि रोग उत्पन्न करती है वाहनहानि भी करती है जो इसपर बृहस्पतिकी दृष्टिभी हो तो शुभ फलभी देतीहै ॥ २९ ॥ ०व० - तमोमुखेचेन्सुथहाधनाप्तिर्यशः खंधर्मसमु तिश्च ॥ सितेज्ययोगेक्षणतः पदाप्तिः सुवर्णरत्नांबरलब्धयश्च ॥ ३० ॥ मुंथा राहुके मुखसंज्ञक अंशों में हो तो धनप्राप्ति और यश सौख्य धर्मकी उन्नति होती है. शुक्र बृहस्पतिसे युक्त वा दृष्टभी हो तो अधिकार प्राप्ति और सुवर्णरत्न वस्त्रलाभभी होते हैं ॥ ३० ॥ अनुष्टु० - भोग्याराहोलवास्तस्य मुखं पृष्टगतालवाः ॥ ततः सप्तमभे च्छंविमृश्येतिफलंवदेत् ॥ ३१ ॥ राहुके मुखपुच्छलक्षण कहते हैं राहुकी वक्रगति स्पष्टही है जो राहुके एक राशिमें भोग्य अंश हैं वह मुख और भुक्तांशको पृष्ठ कहते हैं किसी २ मत है कि मुखपृष्ठ में राहु स्थित अंशसे १५ । १५ अंश पूर्व और पीछेके लेते हैं और इससे सप्तम राशिमें केतु रहताहै यह पुच्छ कहाता है. तारतम्य विचारके फल कहना ॥ ३१ ॥ इं० व तत्पृष्ठभागेनशुभप्रदास्यात्तत्पुच भागाद्रिप्रभीतिकष्टम् ॥ पापेक्षणादर्थसुखस्यहानिश्चेज्जन्मनीत्थंगृहवित्तनाशः ॥ ३२ ॥ राहुके पृष्ठभाग अर्थात् राहुस्थित अंशसे विपरीत पूर्व पंद्रह वा राश्यंतप- र्यन्त अंशके आभ्यंतर मुन्था हो तो शुभ फल नहीं देती और पुच्छगत अर्थात् केतुयुक्त हो तो शत्रुसे भय और कष्ट देती है तथा पापग्रह दृष्टि से धन सुखकी हानि करती है ऐसेही जन्ममें मुंथा हो तो गृह और धनका नाश करती है ॥ ३२ ॥
पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/१२७
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