ताजिकनीलकण्ठी । अथ ग्रहयुक्तदृष्ट. थाफलम् । उपजा० - यदींथिहासूर्य्यगृहे युतावा सूर्येणराज्यं नृपसंगमंच | दत्तेगुणानांपरमामवाप्तिस्थानांतरस्येतिफलंदृशोपि ॥ २ ॥ मुंथाको प्रत्येक ग्रह युक्तका फल कहते हैं सूर्यकी राशि ५ में हो अर्थात् सूर्यके साथ वा सूर्य्यसे दृष्ट हो तो कुलानुमान राज्य मिले तथा राजाकी संगति मिले, स्त्री व भूषणादि श्रेष्ठ भोग मिलें ॥ २४ ॥ उपजा० कुजेन का जभे कुजेन दृष्टा च पित्तोष्णरुजंविधत्ते ॥ शस्त्राभिघातं रुधिरप्रकोपं सौरीक्षिता सौरिगृहे विशेषात् ॥ २५ ॥ मुंथा मंगलसे युक्त वा दृष्ट हो मंगलकी राशि १ |८ में हो तो पित्त विकार उष्ण रोग देतीहै, और शस्त्र से घात रुधिर कोपसे कष्टभी करती है, ऐसी मुंथा शनिसे युक्त वा दृटभी हो यद्वा शनि राशिमें मंगलसे युक्त वा दृष्ट हो तो पूर्वोक्त फलको विशेष बढायदेती है शनि मंगलका मुन्थाके नि- मित्त परस्पर तुल्य फलहै ॥ २५ ॥ उपजा० - चंद्रेण युक्तेंदुगृहेथदृष्टेंदुनापि वा धर्मयशोभिवृद्धिम् ॥ नैरुज्यसंतोषमतिप्रवृद्धिं ददाति पापेक्षणतोऽतिदुःखम् ॥ २६ ॥ मुंथा चन्द्रमासे युक्त चन्द्रमाके राशि ( ४ ) में अथवा चन्द्रमासे हट हो तो धैर्य तथा पशकी वृद्धि करती है नीरोगिता तथा प्रसन्नताकी तो अतिही वृद्धि देती है और पापग्रहकी दृष्टि भी हो तो अतिदुःख करती है ॥ २६ ॥ उपजा० बुधेनशुक्रेणयुतेक्षितावा तद्भेपिवास्त्रीमतिलाभसौख्यम् ॥ धर्म यशश्चाप्यतुलं विधत्ते कटंच पापेक्षणयोगतः स्यात् ॥ २७ ॥ (११८) • मुंथा बुध अथवा शुक्र से युक्त वा दृष्ट अथवा इनके राशि २ । ३ । ६|७| में हो तो स्त्री तथा बुद्धिलाभ और सुख होवे तथा अनुपम धर्म और यशभी देती है इसमें पापग्रहकी दृष्टि वा योगभी हो तो कंष्ट होताहै ॥ २७ ॥ उपजा० - युतेक्षिता वा गुरुणा गुरोर्भे यदींथिहा पुत्रकलत्रसौख्यम् ॥ ददाति रत्नांबरंधर्मसौख्यं शुभेत्यशालादिहराज्यलाभः ॥ २८ ॥
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