भाषाटीकासमेता । (११७) वर्षलम से मुन्था पंचम शुभ ग्रह स्वस्वामियुक्त दृष्ट हो तो पुत्रवृद्धि करती है इत्यादि जो जन्म तथा वर्षलझसे अनिष्ट स्थानमें हो तथा पापयुत दृष्टवा पा- पत्थशालिनी हो वह भाव अवश्य नष्ट होगा ॥ २० ॥ अनुष्टु०-वर्षेप्यनिष्टगेहस्था यद्भावे जनुषिस्थिता ॥ ऋरोपघातात्तंभावनाशयेच्छुभयुक्छुभा ॥ २१ ॥ जन्मलनसे ४|६|८|१२ दुष्ट भावमें तथा वर्ष में ऐसेही अनिष्ट स्थानों- में हो तथा पापग्रहयुक्त वा दृष्ट स्वामीके अस्तंगतादिसे निर्बल हो तो. उस आवको नाश करती है और स्वस्वामियुक्त दृष्ट वा इत्यशालसे शुभ फल देती है ॥ २१ ॥ भुजंगप्रयात - जनुर्लग्नतस्तुर्य्यगासौम्ययुक्ताब्दवेशेपितुर्दुव्य- लाभंविधत्ते ॥ नृपाद्भीतिदापापयुक्तातिकष्टाष्टमादावपीत्थंवि मशविधेयः ॥ २२ ॥ जन्मलग्नसे मुंथा चतुर्थ भावमें शुभग्रहयुक्त हो तो पिताका द्रव्य धन भूम्यादिलाभ करती है, ऐसेही पापयुक्त हो तो राजासे भय और आजीवन अति कष्टसे होवे, ऐसेही जन्म लग्नसे अष्टमगत शुभयुक्त हो तो शुभफल तथा पापयुक्त होनेमें अनिष्ट फल देती है ऐसेही षष्ठादि स्थानों में भी बुद्धि विचारसे मुंथाका तारतम्य देखके फल कहना ॥ २२ ॥ शालिनी - यस्मिन्भावे स्वामिसौम्येक्षिताचेद्भावोजन्मन्येषय- स्तस्यवृद्धिः ॥ एवंपापैर्नाशउक्तस्तुतस्येत्यूह्यंवीर्य्याद्वर्षपस्या- स्ति सौख्यम् ॥ २३ ॥ वर्षलग्नमें मुंथा स्वस्वामी शुभग्रह दृष्ट युक्त जिस भाव में हो वह जन्म- लग्नसे जो भावमें हो उस भावकी वृद्धि करती है, जैसे वर्ष में मुंथा चतुर्थ शुभग्रह वा स्वामियुक्त वा दृष्ट है और जन्मलनगणनासे यह भाव तीसरा होता है तो इस वर्ष में भ्रातृसम्बन्धी शुभफल होगा तथा पापग्रहयुक्त वा दृष्ट जिस भावमें हो वह जन्मलग्नसे जो भाव हो उसकी हानि होती है परन्तु वर्षेश बलवान् तथा शुभग्रह हो तो मुंथा पापयुक्तका पूर्वोक्त फल न होगा ॥ २३ ॥ ॥ इति मुंथाभावफलम् ॥
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