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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/१२३

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भाषाटीकासमेता । (११५) उपजा० - भयंरिपोस्तस्करतो विनाशोधर्मार्थयो दुर्व्यसनामयश्च ॥ मृत्युस्थिताचेन्मुथहानराणां बलक्षयः स्याद्गमनंसुदूरे ॥ १२ ॥ मुंथा अष्टम भाव में हो तो शत्रुसे भय चोर धन धर्मका नाश दुष्ट व्यसन, जुवाँ चोरी वेश्या आदिमें नाश हो रोगभी पैदा हो बलहानि हो बहुत दूर गमन निरर्थक करना पड़े ॥ १२ ॥ इंद्रवं० - स्वामित्वमर्थापगमो नृपेभ्योधर्मोत्सवः पुत्रकलत्रसौख्यम् ॥ देवद्विजार्चापरमंयशश्च भाग्योदयो भाग्य गतेंथिहायाम् ॥ १३ ॥ नवम स्थानमें मुंथा हो तो सब लोगों में स्वामित्व मिले, राजासे घन आवे, धर्म संबंधी उत्साह होवे पुत्र और स्त्रीका सुख मिले, देव ब्राह्मण पूजन होवे, पूरा यश मिले ऐश्वर्य बढे ॥ १३ ॥ उपजा० - नृपप्रसादं स्वजनोपकारं सत्कर्मसिद्धिं द्विजदेवभम् ॥ यशोभिवृद्धिं विविधार्थलाभं दत्तेंवरस्था सुथहा पदाप्तिम् ॥ १४ ॥ मुंथा दशम स्थान में हो तो राजासे प्रसाद मिले अपने मनुष्योंका उपकार होवे. भले कर्म की सिद्धि तथा देवता ब्राह्मण की भक्ति अपनेसे बने यश बढे, अनेक प्रकार धन लाभभी देती है और (पदाप्तिम् ) उत्तमस्थानभी देती है १४ उपजा० – यदींथिहा लाभगता विलास सौभाग्यनैरुज्यमनःप्रसादाः ॥ भवंति राजाश्रयतो धनानि सन्मित्रपुत्राभिमतातयश्च ॥ १५ ॥ - मुंथा ग्यारहवें स्थानमें हो तो अष्ट प्रकार शृंगारका विलास और सौ- भाग्य नीरोगिता मनकी प्रसन्नता होवे, राजाके आश्रयसे धन मिले, अच्छे मित्र और पुत्र मिलें मन मानती भलाई होवे ॥ १५ ॥ उपजा० - व्ययोंधिको दुष्टजनैश्च संगो रुजातनौ विक्रमतोप्यसिद्धिः ॥ धर्मार्थहानिर्मुथहाव्ययस्था यदातदास्याज्जनतोऽपिवैरम् ॥ १६ ॥ मुंथा बारहवें स्थानमें हो तो व्यय बहुत होवे दुष्टमनुष्योंकी संगति मिले शरीरमें रोग होने पराक्रम करनेमें परिश्रम व्यर्थ जावे. धर्म और घनकी हानि होबे सज्जनोंसे वैर होवे ॥ १६ ॥