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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/११९

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भाषाटीकासमेता । अनुष्टु० - हृद्दे याहार्श यः खेटः आधत्तेत्रचयोमहः || जन्मन्यव्देचतादृक्त्वे तदात्मफलदस्त्वसौ ॥ ३५ ॥ • जन्ममें जो ग्रह जिस प्रकारकी हद्दामें होकर दूसरेका तेज ग्रहण करता हो वर्षमें भी उसी प्रकार हृद्दामें हो तो अपना फल अपने संबंधी ग्रहको दे- -ता है अर्थात् जन्ममें जिस हद्दामें यह हैं उसी हद्दामें जो कोई ग्रह हो उसके - साथ मुथशिली हो तो जन्मके उस ग्रहका तेज लेलेता है, जैसे जन्ममें राज्य भावेश मंगल मेषके २० अंश अपने हुद्दामें हैं, और शुक्रादि कोई ग्रह सुखाधीश १६ अंशपर स्थित होकर मुथशिली होनेसे तेज ग्रहण करता है. एवं वर्ष में मंगल स्वहद्दामें होकर शुकते मुथशिली हो तो शुक्र अपनी दशामें मंगलके स्वभाव तुल्य फल दशम भावसंबन्धी फल भी देगा ॥ ३५ ॥ अनुष्टु० - योजन्मनिफलं दातुं विभुर्मूसरिफोस्यचेत् ॥ अन्दलग्नाब्दपतिनातस्मिन्नन्देनतत्फलम् ॥ ३६ ॥ जो ग्रह जन्मसे शुभ वा अशुभ फल देनेको समर्थ है वह वर्ष में वर्ष - लग्नेश वा वर्षेशके साथ मूसरिफ योग करता हो तो जन्मकालोक्त फल वर्ष में नहीं होता है, जो इनके साथ ईसराफ हो तो जन्मकालोक फल वर्ष में होता है, ईशराफ, यूसरिफ कोई भी नहीं हो तो जन्मोक्तफल जन्महीमें वर्षोत वर्षहीमें फल देता है इसका उदाहरण अगले श्लोक में है ॥ ३६ ॥ इन्द्रवज्रा – पुत्राधिपो जन्मनि पुत्रभावं पश्यन्सुतंदातुमसौसम- मर्थः॥ वर्षेत्रपुत्राब्दपमूसरीफी पुत्रस्य नाशोभवतीहवर्षे ॥ ३७ ॥ जन्मकालमें पुत्रभावेश पुत्रभावको देखे "उपलक्षणसे" वा पुत्र स्थानमें हो तो अपनी दशामें इसे पुत्र देनेकी सामर्थ्य है, वर्षमें यही जन्मका पुत्रभा- वेश वर्षंलग्नेश वा वर्षेशसे वा पंचमेशसे मूसरीफ योग करें तो इस वर्ष में अवश्य पुत्रनाश करेगा यह पर्व श्लोकका उदाहरण है, ऐसेही सभी भाषका विचार करना ॥ ३७॥ · ( ११३ ) अनुष्टु० - अब्देश्वरोगुरुमित्रहद्दमित्रदृशाशशी || महोत्राधाद्य मुद्दिश्यवर्षेशस्तेनशोभनः ॥ ३८ ॥