(११०); ताजिकनीलकण्ठी । रहे. इतनी वस्तुओंका लाभ भी होवे, और पापग्रहसे युक्त वा दृष्ट हो तो समस्त फल दुष्टही होंगे शुभ दृष्टिसे शुभं जानना ॥ ३१ ॥ व ति० - मंदबलेन रहितेऽब्दपतौ क्रियाणां वंध्यत्वमर्थविलयो विपदोरिभीतिः ॥ स्त्रीपुत्रमित्रजनवैरकदन्नमुक्तिः सौम्येत्थशा- लघुजिसौख्यमपीषदाहुः ॥ ३२ ॥ शनि होनबली वर्षेश हो तो कर्ममात्रकी वंध्यत्व ( निष्फलता ) होवे, ( कुतिअन्न ) कुलत्थ, कोद्रव, जुवार, सांबा, आदि भोजनको मिले घननांश तथा विपात, शत्रुभय और स्त्री पुत्र मित्र जनोंसे वैर होवे, जो शुभग्रहसे इत्थशाली वा युक्त हो तो थोडा सुख भी होगा ऐसा कहते हैं ॥ ३२॥ व ति वर्षेश्वरो भवति यः सदशाधिपोन्दे ज्ञेयोऽखिलोन्दज उपोर्बलमस्य चित्यम् ॥ वीर्यान्वितेच निखिलं शुभमन्दमाहु- हने त्वनिष्टफलतासमतासमत्वे ॥ ३३ ॥ पूर्वोक्त प्रकारसे जो वर्षेश हुआ वही प्रथम दशाधीश भी जानना यतः सभीदशाधीश ग्रहोंका यह राजा होता है इसका फल थोडा २ सभीके दशाओं में होता है, और वर्षेश बल जन्ममें भी पंचवर्गी कमसे वर्षतुल्य गिनना, जन्म वर्षका बल मिलायके बलाबल जानना, दोनहूं मेंसे चली होनेसे पूर्णबली कहाताहै, संपूर्ण वर्ष में शुभही फल देता है, इसी क्रमसे उत्तम मध्यम कनिष्ठ भी बल जानना, हीनबलमें मध्यम फल कनिष्ठमें अशुभ सममें समफल समस्त वर्षमें विचारसे कहना बलाबल विधि पूर्ण कही हैं ॥ ३३ ॥ उ० जा० - येनेत्थशालोब्द पतौग्रहाऽसौस्वीयस्वभावात्सुफलंददाति ॥ 'शुभेसराफे शुभमस्तिकिंचिदनिष्टमेवाशुभसूसरीफे ॥ ३४ ॥ वर्षेश जिस ग्रहके साथ इत्यशाल करता हो वह यह अपने पूर्वोक्त स्वभावानुसार शुभ फल देता है. जो शुभग्रहसे ईसराफ योग हो तो शुभ फल 'थोडा देता है, और पापग्रहसे इत्यशाल हो तो अनिष्ट फल देता है. बलाबलसे • उत्तम मध्यम व अधम फल का विचार करना ॥ ३४ ॥
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