(१०८) ताजिकनीलकण्ठी | संसार में सभी विश्वास माने अच्छी बुद्धि होने पराक्रमासद्धि तथा निधि 'वस्तु' मिलें राजासे गुरुता मिले, शत्रुनाश होवे ॥ २४ ॥ वसंतति ० - अब्दाधिपे सुरगुरौ किलमध्यवीय्यै स्यान्मध्यमं फलमिदं नृपसंगमश्च ॥ विज्ञानशास्त्रपरताप्यशुभेसराफे दारि यमर्थविलय चकलत्रपीडा ॥ २५ ॥ मध्यबली वृहस्पति वर्षेश हों तो पूर्वोक्त उत्तम बलके फल मध्यम होतेहैं. तथा शुभ ग्रहसे इत्थशालभी करता हों तो राजाका संगम होगा. ज्ञान तथा शास्त्र में तत्पर रहता है जो पापग्रहसे ईसराफ योग कर्त्ता हो तो दरिद्र और धननाश और स्त्रीसे कष्टभी करेगा ॥ २५ ॥ वसंतति • - जीवेन्दपेधमबले धनधर्मसौख्यहानिस्त्यजंति सुत मित्रजनाः सभार्य्याः ॥ लोकापवादमयमाकुलताऽतिक वृत्ति स्तनौ कफरुजोरिपुभीः कलिश्च ॥ २६ ॥ अधमबली वर्षेश बृहस्पति हो तो धन धर्म और सुखकी हानि होवे, तथा पुत्र मित्र लोग और स्त्री उसे त्यागदेवें. संसारमें झूठे कलंक लगनेकी डर होवे. चित्त व्याकुल रहे आजीवन बडे कष्टसे होवे. शरीरमें कफ रोग होवे. शत्रुसे भय तथा कलहमी होवेहै ॥ २६ ॥ वसंततिलकाछंद - शुक्रेब्दपेबलिनिनीरुजताविलासस स्त्ररत्न मधुराशनभोगतोषाः ॥ क्षेमप्रतापविजयावनिताविलासो हास्यंनृपाश्रयवशेन धनं सुखंच ॥ २७ ॥ करे. उत्तम बली वर्षेश शुक्र हो तो शरीर नीरोग रहै. नित्यमुखसे विलास शुभ शास्त्र तथा मिष्टान्न भोजनादि भोगों से प्रसन्नता रहे सर्वथा कुशल प्रताप बढ़े शत्रुसे जय मिले स्त्रीविलासका मुख रहै. प्रसन्नता रहे और राजा के आश्रयसे धन तथा सुख मिले ॥ २७ ॥ वसंतति :- अब्दाधिपे भृगुसुते खलुमध्यवीय्यै स्यान्मध्यमं निखिलमेतदथाल्पवृत्तिः ॥ तं च दुःखमखिलं सुनिबद्धवृत्तिः यापारिवीक्षितयुते विपदोऽर्थनाशः ॥ २८ ॥
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