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पृष्ठम्:ताजिकनीलकण्ठी (महीधरकृतभाषाटीकासहिता).pdf/११४

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( १०६ ) ताजिकनीलकण्ठी | नटबली चंद्रमा वर्षेश हो तो शीत तथा कफ आदिक रोग हों चोर ठग आदिसे भय हो और अपने मनुष्योंमें कलहभी कहते हैं दूर गमन होवै पुत्र व स्त्रीका सुख नष्ट होवै और यह अतिहीनवली हो तो शीतकफादि रोगों से मृत्यु समान कष्ट होताहै ॥ १७ ॥ व० ति० - भौमेन्द पे बलिनिकीर्त्तिजयारिनाशः सेनापतित्व- रणनायकता प्रदिष्टा ॥ लाभःकुलोचितधनस्य नमस्यता च लोकेषु मित्रसुतवित्तकलत्र सौख्यम् ॥ १८ ॥ बलवान मंगल वर्षेश हो तो कीर्त्ति बढ़ शत्रुसे जीत मिले तथा शत्रुनाश होवे सेनापतिका अधिकार तथा रणमें श्रेष्ठताभी होवै है और कुलउचित धनकी प्राप्ति होवै. संसारमें साधारण मनुष्योंसे नमस्कार प्रणाम करनेके योग्य होवे. मित्र पुत्र धन स्त्रीका सौख्य मिलै ॥ १८ ॥ व० ति० - मध्येब्दपेव निसुते रुधिरसुतिकोपोधिकोझकट शक्षितानि ॥ स्वामिस्वमात्मगणतो बलगौरवं च मध्यं सुखं निखिलमुक्तफलं विचित्यम् ॥ १९ ॥ मध्यबली मंगल वर्षेश हो तो शरीरसे किसीप्रकार रुधिर गिरै क्रोध बहुत आवै, शस्त्रकी चोट लगने से घाव होवै और अपने जनोंमें स्वामित्व तथा बल और गुरुता मिलै. सौख्य मध्यम होवे इसप्रकारका कहा हुआ फल मध्यबलमें मध्यमही विचारना ॥ १९ ॥ व ति० - हीनेन्द पेऽसृजिभयं रिपुतस्कराग्निलोकापवादद्भव मात्मधिया विनाशः ॥ कार्य्यस्य विद्यमतिरोगभयं विदेशयानं क्षयोपनयतो गुरुदृष्टयभावे ॥ २० ॥ हीनबली मंगल वर्पेश हो तो शत्रु चोर और अभिसे भय होवे. झूठा कलंक लगनेका भय होवै; और अपनीही बुद्धिसे वस्तु वा कार्यका नाश होवे. तथा कार्य में विघ्न होवे, बहुधा रोगभय तथा परदेशगमन होते. और उद्धतपनसे धन एवं कार्यादिक्षय होवे; परंतु इतने फल ऐसे मंगलपर बृह- स्पतिकी दृष्टि न होनेमें होते हैं, गुरुकी दृष्टि होनेमें सभी शुभफल कहेहैं ॥ २० ॥