( ७७ रजस्वल दोष देखना। संप्रप्तैकादशे वर्षे कन्या या न विवाहिता । मासे असे पिता भ्राता तस्याःविपति शोणिते।। टीका-जो ग्यारहवे' वर्ष में कन्या का विवाह नहीं हो तो महीने २ प्रति जो रजस्वला हो उसके दोष का भागी पिता और बड़ा भाई होता है। द्वादशैकादशे वर्षे तस्याः शुद्धिर्न जायते । पूजाभिः शकुनैर्वापि तस्या लग्नं प्रदापयेत् । टीका-जो ग्यारह बारह वर्ष की कन्या होय और बृहस्पति भी अच्छा न हो तो लग्न ही विचार पूज़ दान करके विवाह कर दे । माता चैव पितां चैव ज्येष्ठभ्राता तथैव च । त्रयश्च नरकं यांति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम्॥ टीका-जो रजस्वला कन्याको भातापिता,बड़ा भाई देखें तो नरक के अधिकारी होते हैं । गुर्विन्द्वर्कवुला गौरी गु विन्दुबल रोहिणी । । रवीदुबलजा कन्या प्रौढ लग्नवल स्मृता ॥ टीका-गौरी जो है उसको बृहस्पति चन्द्रमा सूर्ये तीनोंका बल देखे तो शुभ है । रोहिण को गुरु और चन्द्रमा का चल देखे, कन्या को सूर्य और चन्द्रमा का बल देखे, औौढ़ नाम ११ वर्ष की या इससे ऊपर की लग्न व ही चिंचार के चियाह करदे । गौरी ददन्नागलोके बैकुण्ठे रोहिणी ददेत्।
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