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॥ । श्रीगणेशायनमः ।। ज्योतिश्च सर्वं संगृह [ भाषा टीका ] जलकं प्रक्रू अथल याची ॥ श्लोकं । प्रणम्य परमात्मानं बलथीबृद्धिसिद्धये। समाहूयन्यग्रन्थेभ्य सर्वसंग्रहःलिख्यते ॥ अत्र द्वादश मासों के नात्र संस्कृG और आंध्र में भृशख ज्यैष्ठ अgढ़ को मधु और को माधव और ई को शुक्र और टू को शुचि और मन भी कहते मेष कहते हैं भी कहते हैं मिथुन भूट कहते यत्र श्राचण ६ भाद्रपद आश्विन ' भी कर्तिक को नभ और १ को नभस्य और को ईश व कन्या को बुर्ज और तुला क भी कहते १ सिंह भी कहते हैं भी कहते हैं की भी कहते हैं । मार्गशीर्ष की फौष - साथ फाल्गुन को हि औ क सहाय और को तप व नंतर को तपस्व व कुंभ वृश्चिक भी # धन भी कहते हैं की भी कहते हैं की भी कहते हैं। कहते हैं