२ अe ४० भा० सवो परिक्रम न वर्गवणौ न गणो न योनिः द्विद्वदशेचैवषडाष्ट के वा। तारा विरुद्ध नव पञ्चमं स्याद् शीश मैत्री शुभदो विवाहे । टीका-घनै वर्ण, गण, योनी, राशि, षडष्टकतारा, नाड़ी नों, पांचवे इतने गुणों में से कोई भी मत मिलो और बर कन्या का एक स्वामी हो या दोनों में मित्रता हो तो जानो सत्र चीजमिलगई यह चिचाह शुभ दायक होता है। अथ मङ्गली देखना लग्ने व्यये च पाताले यामिने चाष्टमे कुजे । फ्नी हन्ति स्वभर्तारं भर्ना भाय्यं हनिष्यति ॥ टीका-–१ । १२ । ४ । ७ । ८ इन स्थानोंमें जिसके मङ्गलहो वो मङ्गलीहोता है जो वर कन्या मङ्गली हों और उनका विवाह होतो शुभ है जो वर मङ्गली और कन्या सादी या कन्यामङ्गली वर सादा हो तो अशुभ है जो सद हो उसी की मृत्यु लिखी है। मङ्गली दोष दूर होना यामित्र च यदा सौरिर्लग्ने वा हिबुके ऽथवा। अष्टमे द्वादशे चैव भौमदोषो न विद्यते ॥ टीका-जिसके ७, १,७,८१२ इन स्थानों में शनिश्चर हो तो मङ्गली का दोष उसको नहीं होता।
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