२ ४० ( ५७ } ५० भe टीका--जो पाँचचे घर का मालिक सतवे’ स्थानमें हो तो गर्भ नष्ट हो यदि ६ । ८ । १२ इन स्थानों को छोड़कर और स्थानों में हो तो पुत्र का सुख के है । ६ रिप्लव फलम, षष्ठेशो लग्नगेहस्थो रिषु हंता नरो भवेत् । केन्द्र चेद् रिषु भिःकिंचित् व्ययाऽष्टरिषु गेनहि॥ टीका--जो छठे स्थान का स्वामी लग्न में हो तो दुश्मन के नाश करने वाला हो यदि वह और ग्रह के द्र में हो तो दुश्मनों का भय ज्यादा रहे और ६ । ८ । १२ । इन घरों में हो तो दुश्मन नष्ट कहना और मामाओं को भी नष्ट करता है । ७ स्त्रभाव फलम सप्तमेशः केन्द्रगो वा पित्तादिभिर्विकार । स्त्रीसौख्यं विजानीयात् भ्रातृवन् धनवानपि । अन्यत्रयदि गेहस्थे स्त्री विहीनो नरो भवेत्। धने सहजेऽथलाभे वा स्त्रीसौख्यं महद भवेत् ॥ टीका-जो सप्तमेश अर्थात् ७ वे " स्थान का मालिक केन्द्र १ । ४ । ७ । १० इन स्थानों में हो तो पिचादि विकार युक्तहो और स्त्री का सुख भी अच्छा हो और भाई का मुखधन का सुख बढ़ता है और इनके सिवा और स्थानों में हो तो ‘स्त्री को मुख नहीं हो और जो ३ या ११ स्थान में हो तो स्त्री का मुख अच्छा हो ।
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