• झ९ ( ५४ ) भe अथ नाड़ी फलम्
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एक नीस्थ नक्षत्रे दम्पत्योर्मरणं ध्रुवम् । सेवायांच भवेद्धनिर्विवाहेचाशुभं भवेत् ॥ टीका-ज़ो वर कन्या दोनों की एक नाड़ी हो तों दोनों की मृत्यु हो और नाड़ी के वेध में विवाह करे तो हानि हो । आदि नाड़ी वरं हन्ति मध्य नाड़ी च कन्यकाम् । अन्यनाड़ी द्धयोमृत्युर्नाड़ीदोषं त्यजेद बुधः ॥ टीका—जो आदि नाड़ीका बेध होय तो बरको अरिष्ट करे और मध्य नाड़ीका वेध होय तो कन्याको कष्टकरे । अन्य नाड़ी का वेध लगे तो दोनों की मृत्यु हो ।। वेध नाड़ीकोही कहते हैं। ‘एक नक्षत्र जातानां नाड़ी दोषो न विद्यते । अंन्थीषति वेधेषु विवाहो वर्जितः सदा ॥ टीका---जो बर कन्य दोनों का एक ही नक्षत्र का जन्म होय तो एक नाड़ी का दोष न मानिये । अन्य नक्षत्र में जन्म होय तो विश्वाह वर्जित है । अथ गोचरं ग्रह देखना त्रिषष्ट कादशे शमो राहुः केतुः शनिःशुभः। षष्ठाष्टमे द्वितीये वा चतुर्थ दशमे बुधः । द्वितीये पंचते जीवः सप्तमे नवमे शुभः । एकोदशे शहः सर्वे सर्वकार्येषु शोभना ॥