जा० सं० { ५३ ) २० भा० ग्रह हो अथवा दोनों राशि में मित्रता हो और नाड़ी नक्षत्र शुद्ध रहें तो दुष्ट भकूट आदि में भी विवाह होता है । अथ नाड़ी चक्रम् = =
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-- ~======= अन्त कृ> } रो० लेपा म० } स्या' वि० ई० पू० / अ२ । रे० ॐ अथ यी । देखना ३ आदिमध्यान्तवपि अन्तमध्यादिभानिच । अश्वि न्य दिक्रमेणैव रेवत्यन्तं सुसंलिखेत् ॥ ऊध्र्वगा वेद रेखiः स्युस्तिर्यगूख दश स्मृताः सर्पाकारंलिखेद्भानां नाडीचक्र वदेद्वुधः ॥ टीका-आदि-पक्षय, अन्य अन्त्य मध्य, आदि इस प्रकार अश्विनी रेवती तक गिने ४ रेखा खड़ी और १० रेखा तिी° इसी प्रकार सत्ताईस कोठों को नाड़ी चक्र कहते हैं । नाड़ी दोष देखना नाड़ीदोषस्तु विप्राणां वर्णदषश्च क्षत्रीये । गणदोषश्चवैश्येषु योनिदोषस्तु पादजन । टीका-नाड़ी का विचार ब्राह्मण को अपश्य करना चाहिये अर्चे का विचार क्षत्री को करना चाहिये । गण का विचार वैश्य को करना चाहिये । योनी का विचार शद्र को फरना चाहिये।