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पृष्ठम्:ज्योतिष सर्व संग्रह.pdf/२३

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जा० अ० ( १७ )

e श्लेषा नक्षत्र फलम् मृद्भस्यनेत्रगलकांसयुगं च बाहू- इजाज्ञा गुह्य पदमित्यहि देहभागः ॥ वणाद्रि नेत्रहुतभुङ्क अति नाम रुद्र-षड् नंद, पंच शिरसः क्रमशस्तु नाड्यः ॥१॥ राज्यं पितृक्षयो मातृनाशः काम क्रियारतिः ? पितृभक्तो बली स्खघ्नस्यागी भोगी धनी क्रमात् ॥२॥ टीक-श्लेषा नक्षत्र के जिस भाग में बालक का जन्म हो उसका फल कहन । श्लेषा नक्षत्र की पहली ५ घड़ी में बदल का जन्म हो तो राज प्राप्ति में दूसरे भाग की ७ घड़ी में पित्ता को कष्ट । तीसरे भाग की २ घड़ी में माता को कष्ट । चौते. भाग की ३ घड़ी में पर स्त्री रत । पांच’ भग की ४ घड़ी से पिता का भक्त । छट भाग की ८ घड़ी में बलवान् । सातों भाग को ११ घड़ी में आत्मघाती । आठवें भाग की ६ बड़ी में त्यागी । नञ्चमी भाग की & घड़ी में भोगी । दशवें भाग की ५ घड़ी में धनवान् । इस प्रकार ६० घड़ी के १० भाग करने फल कहें । मूल ज्येष्ठा श्लेषा इन के अलग २ विचार जो इन ६ नक्षत्रों में से किसी नक्षत्र में बालक का जन्म हो तो इनका २८००० भन्त्र का जाप करवाये या जितनी श्रद्धा हो दसवें दिन साधारण दहन करने के बाद और जवह