ब० ० ४० । मूले नशोहि मूलस्य स्तम्भे हानिर्धनक्षयः। त्वचि भ्रातुर्विनाशीश्च शाखायां मतृपीडनम् ॥ परिवरक्षयं पत्रं पुष्पे मन्त्री च भूपतिः । फले राज्यं शिखायां स्या अल्पजीवी च बालकः टीका-अवमूल संज्ञक नक्षत्र के विचरने की रीति मूलचल से कहते हैं। मूल वृक्ष बनाकर ८ घंड़ी जड़ में धरे ६ स्तम्भ में ११ त्वचा में नौ शाखा में १४ पत्र में ५ पुष्ष में ४ फल में ३ शिखा में इस प्रकार ६० घड़ी धरिये। फिर उसका फल कहै । जो मूल की ८ घड़ी में बालक का जन्म हो तो मूल नाश हो । स्तन्भ की ६ घड़ी में होय तो धन हानि। त्वचा की ११ घड़ी में होय तो आत को न्श । शाखा की नौ घड़ी में होय तो आता को पीड़ा करे । पलों की १४ घड़ी में होय तो परिवार का नाश। फूलों की ५ घड़ी में होयतो राजा का मन्त्री हो। फलों की ४ घड़ी में जन्म हो तो राजा हो । अथवा वंश में या देश में भी होय। शिखा की ३ घड़ी में जन्म हो तो आयु अल्प पादे अर्थात् उमर थोड़ी हो । मूख वृक्ष फलम् } शिखा | फल } फूल ? शाखा भी स्वचा स्तम्भ | मूल बन्न | | ३ | ४ | ५ | १४ | ६ | ११ | ६ । ८ । -
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अस्थायु राणा राजा संवरिट क्षयमा कष्ट भ्रा० नाधमझ० सू०माश