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पृष्ठम्:ज्योतिष सर्व संग्रह.pdf/२०

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जन: ० ( १४ ) में भा टीक-नन्दा तिथि के आदि की-पूर्णा के अन्त की एक एक घड़ी अशुभ होती है । अथ नक्षत्रएडन्तिम ज्येष्ठा श्लेषा रेवती च नक्षत्रान्ते घटिकाद्वयम् । आदे मूलमश्न श्विन्या झगण्डे घटिकाद्वयम् । टीका-ज़्येष्ठा श्लेषा रेवती के अन्त की २ धड़ी और मूल मघा अश्विनी के आदि की दो दो घड़ी शुभ कार्य में अशुभ होती हैं । । अथ लग्नगण्डांतमाह मीनवृश्चिक कफी ते घटिकार्ध परिस्यजेत् । आदो मेषस्त्र चापस्य सिंहस्य घटिकार्मुकम् ॥ फा-मीन, ऋषिक, फर्भ-के अन्त की आधी धड़ी, मेष, धन, सिंह के आदि की आधी घड़ी में शुभ काम न कीजे । तिथिगण्डे भगण्डे च लग्न गण्डे च जातकः । न जीवति यदाजातो जीविते च धनो भवेत् ॥ टीका-तिथि, नक्षत्र, लग्न के गडांत में बालक का जन्म हो तो न जीवे । जो जी तो धनी हो । ये छः नक्षत्र गड हैं। सू० ज्ये० श्ले० अ० रे० स० । ज्ये० स० श्ले० इन तीन का रिवाज जारी है । अ० १० सं० इन तीन का कम है ।