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पृष्ठम्:ज्योतिष सर्व संग्रह.pdf/१३८

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( १३२ ) योग वर्जित हैं । कन्या, मिथुनतुल, सफ़र ये लग्न शुभ हैं । चन्द्रधल और शकुन विचार कर यात्रा कीजे । नित्य दिशा देखना । तिथि वारं च नक्षत्र' नामाक्षरसमन्वितम् । नवभिश्च हरेद्ग शेषं दिनदशोच्यते ॥ रविश्चन्द्रो भौमराहु गुरुमन्दज्ञके हितो। क्रमेण तादिशा ज्ञेया फलं पूर्वेक्तमेवहि ॥ टीका-तिथि वार नक्षत्र अपने नामके अक्षर सब इकड़ कर के ३ से भाग दे । १ चचे तो बर्य की दशा जानना २ चचे तो चन्द्रमा की,३खचेतोभौमकी । ४रहेंतो राहुकी । यचेतोगुरुकी । ६ बच्चे तो शनि की । ७ च्चे तो बुधको। ८ बचे तो केतु की । शून्य बचे ही शुरू की । फल इसका ऐसा जानो जैसा वर्ष में ऋग्ध दृश्य को है | जन्म तारा चतुर्थी तिथिवारसमन्विता। अष्टभिस्तु हरेद्ग शेषांते च दशा स्मृता। रविचन्द्रकुजश्व गुरुशुक्रशनिः क्रमात् । शून्यशेषे यदा जातो राहरपि दश स्मृता ॥ टीका-जन्म नक्षत्र को दिन नक्षत्र तक गिने फिर चौगुण करे तिंथि चार मिलावे आठका भागद्दे व १, चर्चतो रवि२ बचे तो च द्रमा ३-बचे तो भौम ४ बचे तो बुध भी बचे तो गुरु ६ बचे तो शुक्र,७७चे तो शनि पूरा भाग लगेत राहु और केतुकी । दशा जाननी चाहिए ।