{ १०६ ) प्रवी पंचकं देखना। टुभमिष्ठपंचयाज्यं तृण कंद्विसह । योज्य दक्षिणदियानं गृह्णंछर्दन तंत्री। टीका-धनिष्ठा, आधे को आद लेकर, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उचराभाद्रपद, रेवतो ये मंच नक्षत्र पंचक के हैं। इनमें तृण, कंठ" आदि गेंहीं ग्रहण करन ।दक्षिण की 'यात्रा नहीं करना घर नहीं छावना छत नहीं गेरना।
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शुक्र के डूबने का फल देखना। इसमें कौन कम वर्जित है शुक्र का अंत पंजे में लिखा रहता है । पकुतुङ्ॉग युद्धगमन र प्रतिष्ठात्रतं । विद्यामन्दिरकर्णवधंन महदान’ गुरोःसेवनम् ।। तीर्थस्नानबिवाहंवेदहर्बन मंन्त्रोपदेशः शुभः। दूरेणैव जिजीविषुः परिहरेदस्ते गुरो भार्गवे ॥ टीका-यवंडी, कुंबा, तलाव, बाग, यज्ञ, 'मकान, गबन, क्षौर, मेघालय, मकान की प्रतिष्ठ;, कान विंधव और जो महादान्सुवर्ण का दान करना और गुरु सेवा, तीर्थ यात्रा करना; विवाह करना, देवता का हवन करना, नया व्रत करना, मन्दिर बनाना, झुण्डन, जनेऊ, विद्यारम्भ और जो शुभ कार्यं हैं, सी शुक्र के और वृहस्पति के इंधने में नहीं करने चाहिये। जो जीवने की इच्छा करे तो दूर से ही त्यागन करे ।