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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/९५

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अरण रG -- ऍ१. . ] ! ( x ) अथ चतुर्धभयसे या विचार करनः स कहते हैं मित्र और गृह ग्राम चौपाये औरं अरतीक उबम ये चतुर्थ भावसे विचारकरना चतुर्थभावको शुभग्रह देखते हुये या शुभत्रहों योग होय तो पूर्वोक्त पदार्थोकी अधिकता होती है ॥ १ ॥ अथ पारिवरक्षयकारकयोगः । ८ ईरवक्षशकरगः २. लग्ने चैव यदा जीवो धनेशौरिश्च संस्थितः ॥ | सप्तमे भवत्रं पापाः परिवारक्षयंकराः ॥२॥ , निसं मनुष्यके जन्मकालमें ठग्रमें बृहस्पति धनभावमें श -

  1. में., }} नैश्चर बैठा होय और सातवें पापग्रह बैठे हय तौ वह पारिवा-

_____ का नाश करता है ॥ २ ॥ रिश्मा३ माननयोगः ३ . पापैस्त्रिभिधंद्रमास प्र ।

  • दृष्टं स्यान्माननाशभ को में

६. दृष्टिहीने ॥ व्ययास्तल > . ॥ श्रेष्वशुभाः स्थितावे- Zहैं। स्कुर्वंति ते वै परिवारनाशम् ॥ ३ ॥ जप्त मतु: जन्मकालमें तीन पापग्रहों के चन्द्रमा दृष्ट इयं ते मानका नाश कहना चाहिये न शुभग्रह देखते हों। एक ओगः । जो बारह सातवे उनके विषे पाच प्रल ते य ते परेवर नाश करते हैं ॥ ३ ॥ अथ महायोगः । मातृदयगैः ४ शनिर्धने संजनन यदि स्याल्लग्ने विलग्ने | श./\ } सुग्रानमंत्री । सिंहीसुतः सप्तमभावय- (यु. तो जातम्य जंतोर्जननी न जीवेत् ॥ १॥ निल के जनक्षकछमें अमैर दूसेर और छनमें वृद्- / #२. केनेि में है *यः इअ तं उस ‘भग्नश्चकी माता नई -

  • के ३ ४ ॐ

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