६ ** } अथ सहजभवविचारस्तत्र सहजभावाकि कं चिंतनीयम् । सहोदराणामथ किंकराणां पराक्रमाणामुपजीविनां च ॥ विचारणा जातकशास्त्रविद्भिस्तृतीयभावे नियमेन कार्या ॥ १॥ पराक्रम सहज भाव था विचार करना चाहिये सो कहते हैं सगे भाई और नकर । । । ॐ विकको म्योतिषशास्त्रके जाननेवाले नियम करके विचार करें ॥ १ ॥ भ्रातृवयोगः २ भ्रतृहीनयोगः २ शृ.४ नं.२ ४ में, १. हे पापालयं चेत्सहजं सम
- समत १५,१सका
स्तैः पापैः प्रविल ॐ सय है कितं च भवेदभावः सह । ८ - शी जोपलब्धिस्तवैपरीत्ये - १८७३ न तदातैरेव ॥ २॥ जिस मनुष्यके जन्मकाळमें तीसरे भावमें पापग्रह बैठे होंय और तीसरे भावको सब पाप यह देखने हंय तौ उसके भ्राताओंका अभाव होता है और तीसरे भावमे शुभग्रहकी राशि इंग और शुभग्रह देखते हों तैौ भ्रातृवान् होताहै । २ ।। त्रातृनाशयेगः । क्षेपकः । अग्रे जातं रविर्हति पृष्ट जत शनैश्चरः । अग्रजं पृष्टजं हंति सहजस्थो धरासुतः ॥ ३ ॥ लिस ननुप्रश्ने तीसरे सूर्ये बत्रा होय त बड़े भ्राताओंको नाश करता है और न शनैश्चर अपरे हय त अनिष्ट भ्राताओंका नाश करता है और मंगल तीसरे बैठा होय तो अगाई नेकी दोनों ओर के मानक नग्न करता है ५ ३ ॥ नवांशका ये महजालयस्थाः कलानिधिः क्षोणिमुतेन दृष्टः । नावग्मिताः शुः महाभा भागिन्यस्वन्येक्षिता वै परिकल्पनीयाः । क्रिस , सकलमें अंती मुं:ख्या नवांश देय होय और चंदमा मंगल देखें इथे पुत्री मंझले भरि भाई कह चाहिये जो और ग्रह देखते हय सभी कल्पः
- 3 सारे ६ ५ ॥