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पृष्ठम्:जातकाभरण.pdf/८५

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( ६०) तरभ शिरोक्षिणी कर्णनसा कपालौ हनुर्मुखं च प्रथमे दृकाणे ॥ कंठांसदोर्दण्डककुक्षिवशः क्रोडे च नाभिखिलवे द्वितीये ॥१६॥ वस्तिस्ततो लिंगयुदे तथाण्डावूरू च जानू चरणौ तृतीये ॥ क्रमेण लग्नात्परपूर्वषट्रे मं तथा दक्षिणमंगमम् ।। १७ ।। अंदमा और सूर्य कुइपनि सबभूभके स्वामी हैं और शनैश्चर मंगल तमोगुणी स्वामी हैं भूष शुक रनोगुणके स्वामो होते हैं सूर्यं मिस २ त्रिंशांशमें बैठा होय उस उस त्रिंशांशका स्वमी ते महे वय उसके गुणकी अधिकता मनुष्यमें कहनी ॥ १५ ॥ शरीरके तीन भाग फड्न श उनले पहिले देकागका उदय होय शिर, आँख, कान, नासिक, गाल, ठोढी, मुखपर्वत बारहों अंगों का ए भाग जाना चाहिये. द्वितीय द्रेष्काणका उदय होय तो कंठ संधा, बहु, , वक्षस्यछ, पेट. नाभी मदद्वितीय भाग हैं और जो तीसरे द्रष्झाणका उदय होय ॥ १६ ॥ तो पेडू, लिंग, गुद, ऊरू, जांचे, चरण दोन तृतीय भाग हैं वह कम करके छः छ: अंगोंके भाग दहिने अंग चक्रमें कल्पना करना चाहिये ॥ १७ ॥ भयभद्रकापचक्रम् तृतीयदेकणचक्रम् ॥ । ८.ग क.मी कधा कध न" सिर कान बाहु क. नाक ऋ ऊरू छिद्र • छिद्र || ऊदि छंक्षि मुभव गछ| हृदये नाभी हृदय जया लिंग जंश्च क्षर १ / चरण अथ व्रणमशकादिज्ञानम् । मत्स्यं तिलं लक्ष्म वलानुसारं कुर्वन्ति सौम्या व्रणमत्र पापाः स्वांशस्त्रभागस्थिरगाश्च लक्ष्म युक्तेक्षिताः सौम्यनभश्चरेद्भ१८॥ मस्सा, निळ, इसन, ग्रहोंके बढ़के समान कहना चाहिये जो शुभग्रह होय तो पूर्वोक्त झि केहम चाहिये और न पृथग्रह निस अंगमें बछवान् होय तो प्रण कहना चाहिये जो अझ अग्ने गर्भाश या अपने द्रकाणमें स्थिरराशीमें होय ते पूर्वोक्त चिह्न स्थिर कहना हिये दो गुन अझरने युऊ या दृष्ट अंग होय उसमें मस्सा, तिळ, उहसन कहना वसेि जो १८ ॥ अथ ब्रजकारणमाह । श्वेवैः काष्ठचतुष्पदोत्थं धैर्याम्बुचक्षिप्रभवः शशाङ्कात् ॥ अद्रिणश्यस्रकृतश्च चद्देिभंमः शनेश्वपि मरुदृषद्धेथाम्१९॥

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