सहत । (*३ } है ॥ १२ ॥ जिख मनुष्यके जन्मकाछमें ठग बछवान् हूय न कहहुआ भूरा फ़ हैवाः है और जो क्रम निर्बळ होय अथवा पापयुक होंय वा पापग्रह देखते होय तो थोडा फळ करता है ॥ १३ ॥ नन्वेवमुदाहृतानां संवत्सरादिफलानां समयनियमाभावात् निराधारकत्वेन फलादेशः कथं सम्यग्घटतीति व्यर्थमेव किमर्थमुक्तमिति चेन्न समयनियमोप्यस्ति तथा हि निश्वयकर संवत्सरादिका फल निरधार कहा है और उसके प्राप्त होनेको समयमैः स कहा है तो वह निराधार फळ क्यों फळे? किस प्रकार वट सक्ता हैं तो पूर्वोझ फळब कहनः व्यर्थ है किस वास्ते कहा १ ऐसा तो न कहो क्यों कि समय नियमभी है स तॐ कहते हैं . उक्तानि संवत्सरपूर्वकणां फलानि तत्प्राप्तिरिति प्रकल्प्या । सांवत्सरं सावनवर्षपस्य पाकेयनर्तुप्रभवं खरांशोः ॥ १४ ॥ जो पहिले कहा हुआ संवत्सरादिका फळ कहा है तिसके माप्त होनेका समय कक्ष करते हैं संवत्सरका फ़छ सवन वर्षपतिक दशमें कहना चाहिये और अयन अनुसार ल सूर्यकी दशामें कहना चाहिये ॥ १४ ॥ अथ पूर्वोक्तसंवत्सराणां फलप्राप्तिसमयमाह । मासोद्भवं मासपतेस्तथैदोर्गणोडुपक्षप्रभवं च यत्स्यात् । तिथिप्रभूतं करणोद्भवं च चंद्रान्तरेऽर्कस्य दशाविभागे ॥ १९ ॐ वारोद्भवं वारविभोर्विचिंत्य योगोत्थामिंन्द्धकंबलान्वितस्य / लग्नोद्भवं लग्नपतेर्दशायां दृग्भावपुषाशिजमेव सूम् ॥ १६ # सौर महीनेका फळ मासपतिकी दशमें कहना चाहिये और गण तथा नक्षत्र का है और पक्षफळभी चंद्रमाकी दशमें कहना चाहिये और तिधनात और करषभात श चंद्रमाके अंतरंगें सूर्यकी दशमें कहना चाहिये ॥ १५ ॥ और चारणतफळ थरके स्वामी दशमें कहना चाहिये और योगआतफळ सूर्यचंद्रमामें जो अधिक बली हो उसने में कहना और ऊपगतफळ छनपातिकी दशमें कहना काहिये और दृष्टिभाव राशि इन का इल इनके स्वामीजी देशमें कइ ॥ १६ ॥ अथ डिंभाख्यम् डिंभाख्यचक्रे रविभाव भानां त्रयं न्यसेन्मूर्भ मुखे त्रयं च॥ जे स्कंधयोर्दे भुजयोर्देयं च पाणिद्वये वक्षास पंच भामिN 3
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